28.10.10
16.10.10
हिन्दी भाषा-प्रदूषण के विरुद्ध प्रहार कीजिये !
क्या हिंदी बदल रही है?
Vijay K. Malhotra
पिछले डेढ़ दशक में हिंदी का स्वरूप काफ़ी बदल गया है या फिर इसे जान बूझ कर बदलने की कोशिश हो रही है. कई हिंदी अख़बारों ने तो हिंदी की जगह हिंग्लिश का प्रयोग धड़ल्ले से शुरू कर दिया है.
इसके पक्ष में तर्क ये दिया जाता है कि आज की युवा पीढ़ी जैसी भाषा बोलती है वैसी ही भाषा हम सबको प्रयोग करनी चाहिए. यानी प्रधानमंत्री की जगह प्राइम मिनिस्टर, छात्र की जगह स्टूडेंट्स और दुर्घटना की जगह एक्सीडेंट!
लेकिन क्या ऐसे प्रयोगों से हिंदी का अस्तित्व बच पाएगा? क्या हिंदी भाषाका ये बदलता चेहरा आपको स्वीकार्य है?
--
विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (राजभाषा),, रेल मंत्रालय,भारत सरकार
URL
Vijay K. Malhotra
पिछले डेढ़ दशक में हिंदी का स्वरूप काफ़ी बदल गया है या फिर इसे जान बूझ कर बदलने की कोशिश हो रही है. कई हिंदी अख़बारों ने तो हिंदी की जगह हिंग्लिश का प्रयोग धड़ल्ले से शुरू कर दिया है.
इसके पक्ष में तर्क ये दिया जाता है कि आज की युवा पीढ़ी जैसी भाषा बोलती है वैसी ही भाषा हम सबको प्रयोग करनी चाहिए. यानी प्रधानमंत्री की जगह प्राइम मिनिस्टर, छात्र की जगह स्टूडेंट्स और दुर्घटना की जगह एक्सीडेंट!
लेकिन क्या ऐसे प्रयोगों से हिंदी का अस्तित्व बच पाएगा? क्या हिंदी भाषाका ये बदलता चेहरा आपको स्वीकार्य है?
--
विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (राजभाषा),, रेल मंत्रालय,भारत सरकार
URL
इंदौर में हिन्दी दिवस
आजकल संसद सदस्यों, मध्य प्रदेश के विधायकों और देश भर के हिन्दी समाचार पत्रों के संचालकों तथा संपादकों को डाक से एक बड़ा-सा लिफाफा मिल रहा है।
वे जब इसे खोलते हैं तो उन्हें एक पुड़िया में राख मिलती है। यह राख किस चीज की है इस उत्सुकता को मिटाने के लिए लिफाफा भेजने वालों ने वक्तव्य भी भेजा है। जिसमें कहा गया है- आज हिंदी दिवस के अवसर पर हम इंदौर नगर के बुद्धिजीवी गांधी प्रतिमा के समक्ष देश भर के लगभग सभी हिंदी अखबारों की एक-एक प्रति जुटा कर उनकी होली जलाने के लिए एकत्र हुए हैं। हम सब जानते हैं कि जब निवेदन के रूप में किए जाते रहे संवादात्मक प्रतिरोध असफल हो जाते हैं, तब विकल्प के रूप में एकमात्र यही रास्ता बचता है, जो हमें गांधीजी से विरासत में मिला है।
यह वक्तव्य का बहुत छोटा-सा हिस्सा है। इसे इंदौर में हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) पर जारी किया गया था। इसमें विस्तार से बताया गया है कि अंग्रेजी शब्दों को जबरदस्ती ठूंस-ठूंस कर हिन्दी को एक ऐसी मिश्रित भाषा बनाया जा रहा है जिसमें हिन्दी के शब्द केवल 30 प्रतिशत हों और अंग्रेजी शब्दों का अनुपात 70 प्रतिशत हो जाए। यह भाषा कैसी होगी, इसका एक नमूना इंदौर के ही एक स्थानीय समाचार पत्र से लिया गया है- 'इंग्लिश के लर्निंग बाय फन प्रोग्राम को स्टेट गवर्नमेण्ट स्कूल लेवल पर इंट्रोड्यूस करे, इसके लिए चीफ मिनिस्टर ने डिस्ट्रिक्ट एज्युकेशन ऑफिसर्स की एक अर्जेंट मीटिंग ली, जिसकी डिटेल्ड रिपोर्ट प्रिंसिपल सेक्रेटरी जारी करेंगे।
यह कोई हंसाने के लिए बनाया गया कोई काल्पनिक वाक्य नहीं है, वास्तव में उस अखबार में ऐसा ही छपा था। और यह कोई एक अकेली घटना नहीं है। हिन्दी के बहुत-से समाचार पत्र ऐसी ही भाषा के प्रयोग की ओर बढ़ रहे हैं। मामला अखबारों तक ही सीमित नहीं है। अंग्रेजी के बढ़ते हुए प्रकोप के परिणामस्वरूप और शब्द-निर्माण में हिन्दी वालों के आलस्य के कारण हिन्दी का जो रूप बन रहा है, उसकी कुछ बानगी भी इस वक्तव्य में पेश की गई है- मसलन, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेंट्स, माता-पिता की जगह पेरेंट्स, अध्यापकों की जगह टीचर्स, विश्वविद्यालय की जगह यूनिवर्सिटी, परीक्षा की जगह एक्जाम, अवसर की जगह अपार्चुनिटी, प्रवेश की जगह इंट्रेंस, संस्थान की जगह इंस्टीट्यूशन तथा भारत की जगह इंडिया। इसके साथ ही, पूरे के पूरे वाक्यांश भी हिंदी के बजाय अंग्रेजी के छपना, जैसे आउट ऑफ रीच, बियांड अप्रोच, मॉरली लोडेड, कमिंग जनरेशन, डिसीजन मेकिंग, रिजल्ट-ओरियंटेड प्रोग्राम आदि।
वे जब इसे खोलते हैं तो उन्हें एक पुड़िया में राख मिलती है। यह राख किस चीज की है इस उत्सुकता को मिटाने के लिए लिफाफा भेजने वालों ने वक्तव्य भी भेजा है। जिसमें कहा गया है- आज हिंदी दिवस के अवसर पर हम इंदौर नगर के बुद्धिजीवी गांधी प्रतिमा के समक्ष देश भर के लगभग सभी हिंदी अखबारों की एक-एक प्रति जुटा कर उनकी होली जलाने के लिए एकत्र हुए हैं। हम सब जानते हैं कि जब निवेदन के रूप में किए जाते रहे संवादात्मक प्रतिरोध असफल हो जाते हैं, तब विकल्प के रूप में एकमात्र यही रास्ता बचता है, जो हमें गांधीजी से विरासत में मिला है।
यह वक्तव्य का बहुत छोटा-सा हिस्सा है। इसे इंदौर में हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) पर जारी किया गया था। इसमें विस्तार से बताया गया है कि अंग्रेजी शब्दों को जबरदस्ती ठूंस-ठूंस कर हिन्दी को एक ऐसी मिश्रित भाषा बनाया जा रहा है जिसमें हिन्दी के शब्द केवल 30 प्रतिशत हों और अंग्रेजी शब्दों का अनुपात 70 प्रतिशत हो जाए। यह भाषा कैसी होगी, इसका एक नमूना इंदौर के ही एक स्थानीय समाचार पत्र से लिया गया है- 'इंग्लिश के लर्निंग बाय फन प्रोग्राम को स्टेट गवर्नमेण्ट स्कूल लेवल पर इंट्रोड्यूस करे, इसके लिए चीफ मिनिस्टर ने डिस्ट्रिक्ट एज्युकेशन ऑफिसर्स की एक अर्जेंट मीटिंग ली, जिसकी डिटेल्ड रिपोर्ट प्रिंसिपल सेक्रेटरी जारी करेंगे।
यह कोई हंसाने के लिए बनाया गया कोई काल्पनिक वाक्य नहीं है, वास्तव में उस अखबार में ऐसा ही छपा था। और यह कोई एक अकेली घटना नहीं है। हिन्दी के बहुत-से समाचार पत्र ऐसी ही भाषा के प्रयोग की ओर बढ़ रहे हैं। मामला अखबारों तक ही सीमित नहीं है। अंग्रेजी के बढ़ते हुए प्रकोप के परिणामस्वरूप और शब्द-निर्माण में हिन्दी वालों के आलस्य के कारण हिन्दी का जो रूप बन रहा है, उसकी कुछ बानगी भी इस वक्तव्य में पेश की गई है- मसलन, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेंट्स, माता-पिता की जगह पेरेंट्स, अध्यापकों की जगह टीचर्स, विश्वविद्यालय की जगह यूनिवर्सिटी, परीक्षा की जगह एक्जाम, अवसर की जगह अपार्चुनिटी, प्रवेश की जगह इंट्रेंस, संस्थान की जगह इंस्टीट्यूशन तथा भारत की जगह इंडिया। इसके साथ ही, पूरे के पूरे वाक्यांश भी हिंदी के बजाय अंग्रेजी के छपना, जैसे आउट ऑफ रीच, बियांड अप्रोच, मॉरली लोडेड, कमिंग जनरेशन, डिसीजन मेकिंग, रिजल्ट-ओरियंटेड प्रोग्राम आदि।
10.8.10
क्या हिंदी बदल रही है?
> बहुत अधिक बदलाहट को हिंदी में स्वीकार ही कर लिया गया है बल्कि उसे अधिकाधिक
> प्रयोग भी किया जाने लगा है...यानी कि उसे हिंदी में बिलकुल समा ही लिया गया
> है....किन्तु अब जो स्थिति आन पड़ी है....जिसमें कि हिंदी को बड़े बेशर्म ढंग
> से ना सिर्फ हिन्लिश में लिखा-बोला-प्रेषित किया जा रहा है बल्कि रोमन लिपि में
> लिखा भी जा रहा है कुछ जगहों पर...और तर्क है कि
> जो युवा बोलते-लिखते-चाहते हैं...!!
> ....तो एक बार मैं सीधा-सीधा यह पूछना या कहना चाहता हूँ कि युवा
> तो और भी " बहुत कुछ " चाहते हैं....!!तो क्या आप अपनी प्रसार-संख्या बढाने के
> " वो सब " भी "उन्हें" परोसेंगे....?? तो फिर दूसरा प्रश्न मेरा यह पैदा हो
> जाएगा....तो फिर उसमें आपके बहन-बेटी-भाई-बीवी-बच्चे सभी तो होंगे.....तो क्या
> आप उन्हें भी...."वो सब" उपलब्ध करवाएंगे ....तर्क तो यह कहता है दुनिया के सब
> कौवे काले हैं....मैं काला हूँ....इसलिए मैं भी कौवा हूँ....!!....अबे ,आप इस
> तरह का तर्क लागू करने वाले "तमाम" लोगों अपनी कुचेष्टा को आप किसी और पर क्यूँ
> डाल देते हो....??
> मैं बहुत गुस्से (क्रोध) में आप सबों से यह पूछना चाहता हूँ...कि
> रातों-रात आपकी माँ को बदल दिया जाए तो आपको कैसा लगेगा....??यदि आप यह कहना
> चाहते हैं कि बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा....या फिर आप मुझे गाली देना चाह रहे
> हों....या कि आप मुझे नफरत (घृणा) की दृष्टि से देखने लगें हो...इनमें से जो
> भी बात आप पर लागू हो, उससे यह तो प्रकट ही है कि ऐसा होना आपको नागवार लगेगा
> बल्कि मेरे द्वारा यह कहा जाना भी आपको उतना ही नागवार गुजर रहा है....तो फिर
> आप ही बताईये ना कि आखिर किस प्रकार आप अपनी भाषा को तिलांजलि देने में लगे
> हुए हैं ??
> आखिर हिंदी रानी ने ऐसा क्या पाप किया है कि जिसके कारण आप इसकी
> हमेशा ऐसी-की-तैसी करने में जुटे हुए रहते है...???....हिंदी ने आपका कौन-सा
> काम बिगाड़ा है या फिर उसने आपका ऐसा कौन-सा कार्य नहीं बनाया है कि आपको उसे
> बोले या लिखे जाने पर लाज महसूस (अनुभव) होती है....क्या आपको अपनी बूढी माँ को
> देखकर शर्म आती है...?? यदि हाँ ,तो बेशक छोड़ दीजिये माँ को भी और हिंदी को
> अभी की अभी....मगर यदि नहीं...तो हिंदी कीहिंदी मत ना कीजिये प्लीज़....भले ही
> इंग्लिश आपके लिए ज्ञान-विज्ञान वाली भाषा है... मगर हिंदी का क्या कोई मूल्य
> नहीं आपके जीवन में...??
> क्या हिंदी में "...ज्ञान..."नहीं है...?? क्या हिंदी में आगे
> बढ़ने की ताब नहीं ??क्या हिंदी वाले विद्वान् नहीं होते....?? मेरी समझ से तो
> हिंदी का लोहा और संस्कृत का डंका तो अब आपकी नज़र में सुयोग्य और जबरदस्त
> प्रतिभावान- संपन्न विदेशीगण भी मान रहे हैं...आखिर यही हिंदी-भारत कभी विश्व
> का सिरमौर का रह चुका है....विद्या-रूपी धन में भी....और भौतिक धन में
> भी...क्या उस समय इंग्लिश थी भारत में....या कि इंगलिश ने भारत में आकर इसका
> भट्टा बिठाया है...इसकी-सभ्यता का-संस्कृति का..परम्परा का और अंततः समूचे
> संस्कार का...भी...!!
> आज यह भारत अगर दीन-हीन और श्री हीन होकर बैठा है तो उसका कारण
> यह भी है कि अपनी भाषा...अपने श्रम का आत्मबल खो जाने के कारण यह देश अपना
> स्वावलंबन भी खो चुका,....सवा अरब लोगों की आबादी में कुछेक करोड़ लोगों की
> सफलता का ठीकरा पीटना और भारत के महाशक्ति होने का मुगालता पालना...यह गलतफहमी
> पालकर इस देश के बहुत सारे लोग बहुत गंभीर गलती कर रहे हैं...क्यूँ कि देश का
> अधिकांशतः भाग बेहद-बेहद-बेहद गरीब है...अगर अंग्रेजी का वर्चस्व रोजगार के
> साधनों पर न हुआ होता...और उत्पादन-व्यवस्था इतनी केन्द्रीयकृत ना बनायी गयी
> होती तो....जैसे उत्पादन और विक्रय-व्यवस्था भारत की अपनी हुआ करती थी....शायद
> ही कोई गरीब हुआ होता...शायद ही स्थिति इतनी वीभत्स हुई होती....मार्मिक हुई
> होती...!!
> हिंदी के साथ वही हुआ, जो इस देश अर्थव्यवस्था के साथ हुआ....आज
> देश अपनी तरक्की (उन्नति) पर चाहे जितना इतरा ले ...मगर यहाँ केअमीर-से-अमीर
> व्यक्ति में भाषा का स्वाभिमान नहीं है....और एक गरीब व्यक्ति का स्वाभिमान तो
> खैर हमने बना ही नहीं रहने दिया....और ना ही मुझे यह आशा भी है कि हम उसे कभी
> पनपने भी देंगे.....!! ऐसे हालात में कम-से-कम जो भाषा भाई-चारे-प्रेम-स्नेह की
> भाषा बन सकती है....उसे हमने कहीं तो दोयम ही बना दिया है...कहीं झगडे का
> घर....तो कहीं जानबूझकर नज़रंदाज़ (अबहेलना) किया हुआ है...वो भी इतना कि मुझे
> कहते हुए भी शर्म आती है...कि इस देश का तमाम अमीर-वर्ग ,जो दिन-रात हिंदी की
> खाता है....ओढ़ता है...पहनता है....और उसी से अपनी तिजोरी भी भरता है....मगर
> सार्वजनिक जीवन में हिंदी को ऐसा लतियाता है....कि जैसे खा-पीकर-अघाकर किसी
> "रंडी" को लतियाया जाता हो.....मतलब पेट भरते ही....हिंदी की.....!!! ऐसे
> बेशर्म
> वर्ग को क्या कहें,जो हिंदी का कमाकर अंग्रेजी में टपर-टपर करता है.....जिसे
> जिसे देश का आम जन कहता है बिटिर-बिटिर....!!
> क्या आप कभी अपनी दूकान से कमाकर शाम को दूकान में आग लगा देते
> हैं.....??क्या आप जवान होकर अपने बूढ़े माँ-बाप को धक्का देकर घर से बाहर कर
> देते हैं....तो हुजुर....माई.....बाप....सरकारे-आला (उच्च)....हाकिम....हिंदी
> ने भी आपका क्या बिगाड़ा है,....वह तो आपकी मान की तरह आपके जन्म से लेकर आपकी
> मृत्यु तक आपके हर कार्य को साधती ही है....और आप चाहे तो उसे और भी
> लतियायें,अपने माँ-बाप की तरह... तब भी वह आखिर तक आपके काम आएगी ही...यही
> हिंदी का
> अपनत्व है आपके प्रति या कि ममत्व ,चाहे जो कहिये ,अब आपकी मर्ज़ी है कि उसके
> प्रति आप नमक-हलाल बनते हैं या "हरामखोर......"??
> ----------------------------------------
> प्रयोग भी किया जाने लगा है...यानी कि उसे हिंदी में बिलकुल समा ही लिया गया
> है....किन्तु अब जो स्थिति आन पड़ी है....जिसमें कि हिंदी को बड़े बेशर्म ढंग
> से ना सिर्फ हिन्लिश में लिखा-बोला-प्रेषित किया जा रहा है बल्कि रोमन लिपि में
> लिखा भी जा रहा है कुछ जगहों पर...और तर्क है कि
> जो युवा बोलते-लिखते-चाहते हैं...!!
> ....तो एक बार मैं सीधा-सीधा यह पूछना या कहना चाहता हूँ कि युवा
> तो और भी " बहुत कुछ " चाहते हैं....!!तो क्या आप अपनी प्रसार-संख्या बढाने के
> " वो सब " भी "उन्हें" परोसेंगे....?? तो फिर दूसरा प्रश्न मेरा यह पैदा हो
> जाएगा....तो फिर उसमें आपके बहन-बेटी-भाई-बीवी-बच्चे सभी तो होंगे.....तो क्या
> आप उन्हें भी...."वो सब" उपलब्ध करवाएंगे ....तर्क तो यह कहता है दुनिया के सब
> कौवे काले हैं....मैं काला हूँ....इसलिए मैं भी कौवा हूँ....!!....अबे ,आप इस
> तरह का तर्क लागू करने वाले "तमाम" लोगों अपनी कुचेष्टा को आप किसी और पर क्यूँ
> डाल देते हो....??
> मैं बहुत गुस्से (क्रोध) में आप सबों से यह पूछना चाहता हूँ...कि
> रातों-रात आपकी माँ को बदल दिया जाए तो आपको कैसा लगेगा....??यदि आप यह कहना
> चाहते हैं कि बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा....या फिर आप मुझे गाली देना चाह रहे
> हों....या कि आप मुझे नफरत (घृणा) की दृष्टि से देखने लगें हो...इनमें से जो
> भी बात आप पर लागू हो, उससे यह तो प्रकट ही है कि ऐसा होना आपको नागवार लगेगा
> बल्कि मेरे द्वारा यह कहा जाना भी आपको उतना ही नागवार गुजर रहा है....तो फिर
> आप ही बताईये ना कि आखिर किस प्रकार आप अपनी भाषा को तिलांजलि देने में लगे
> हुए हैं ??
> आखिर हिंदी रानी ने ऐसा क्या पाप किया है कि जिसके कारण आप इसकी
> हमेशा ऐसी-की-तैसी करने में जुटे हुए रहते है...???....हिंदी ने आपका कौन-सा
> काम बिगाड़ा है या फिर उसने आपका ऐसा कौन-सा कार्य नहीं बनाया है कि आपको उसे
> बोले या लिखे जाने पर लाज महसूस (अनुभव) होती है....क्या आपको अपनी बूढी माँ को
> देखकर शर्म आती है...?? यदि हाँ ,तो बेशक छोड़ दीजिये माँ को भी और हिंदी को
> अभी की अभी....मगर यदि नहीं...तो हिंदी कीहिंदी मत ना कीजिये प्लीज़....भले ही
> इंग्लिश आपके लिए ज्ञान-विज्ञान वाली भाषा है... मगर हिंदी का क्या कोई मूल्य
> नहीं आपके जीवन में...??
> क्या हिंदी में "...ज्ञान..."नहीं है...?? क्या हिंदी में आगे
> बढ़ने की ताब नहीं ??क्या हिंदी वाले विद्वान् नहीं होते....?? मेरी समझ से तो
> हिंदी का लोहा और संस्कृत का डंका तो अब आपकी नज़र में सुयोग्य और जबरदस्त
> प्रतिभावान- संपन्न विदेशीगण भी मान रहे हैं...आखिर यही हिंदी-भारत कभी विश्व
> का सिरमौर का रह चुका है....विद्या-रूपी धन में भी....और भौतिक धन में
> भी...क्या उस समय इंग्लिश थी भारत में....या कि इंगलिश ने भारत में आकर इसका
> भट्टा बिठाया है...इसकी-सभ्यता का-संस्कृति का..परम्परा का और अंततः समूचे
> संस्कार का...भी...!!
> आज यह भारत अगर दीन-हीन और श्री हीन होकर बैठा है तो उसका कारण
> यह भी है कि अपनी भाषा...अपने श्रम का आत्मबल खो जाने के कारण यह देश अपना
> स्वावलंबन भी खो चुका,....सवा अरब लोगों की आबादी में कुछेक करोड़ लोगों की
> सफलता का ठीकरा पीटना और भारत के महाशक्ति होने का मुगालता पालना...यह गलतफहमी
> पालकर इस देश के बहुत सारे लोग बहुत गंभीर गलती कर रहे हैं...क्यूँ कि देश का
> अधिकांशतः भाग बेहद-बेहद-बेहद गरीब है...अगर अंग्रेजी का वर्चस्व रोजगार के
> साधनों पर न हुआ होता...और उत्पादन-व्यवस्था इतनी केन्द्रीयकृत ना बनायी गयी
> होती तो....जैसे उत्पादन और विक्रय-व्यवस्था भारत की अपनी हुआ करती थी....शायद
> ही कोई गरीब हुआ होता...शायद ही स्थिति इतनी वीभत्स हुई होती....मार्मिक हुई
> होती...!!
> हिंदी के साथ वही हुआ, जो इस देश अर्थव्यवस्था के साथ हुआ....आज
> देश अपनी तरक्की (उन्नति) पर चाहे जितना इतरा ले ...मगर यहाँ केअमीर-से-अमीर
> व्यक्ति में भाषा का स्वाभिमान नहीं है....और एक गरीब व्यक्ति का स्वाभिमान तो
> खैर हमने बना ही नहीं रहने दिया....और ना ही मुझे यह आशा भी है कि हम उसे कभी
> पनपने भी देंगे.....!! ऐसे हालात में कम-से-कम जो भाषा भाई-चारे-प्रेम-स्नेह की
> भाषा बन सकती है....उसे हमने कहीं तो दोयम ही बना दिया है...कहीं झगडे का
> घर....तो कहीं जानबूझकर नज़रंदाज़ (अबहेलना) किया हुआ है...वो भी इतना कि मुझे
> कहते हुए भी शर्म आती है...कि इस देश का तमाम अमीर-वर्ग ,जो दिन-रात हिंदी की
> खाता है....ओढ़ता है...पहनता है....और उसी से अपनी तिजोरी भी भरता है....मगर
> सार्वजनिक जीवन में हिंदी को ऐसा लतियाता है....कि जैसे खा-पीकर-अघाकर किसी
> "रंडी" को लतियाया जाता हो.....मतलब पेट भरते ही....हिंदी की.....!!! ऐसे
> बेशर्म
> वर्ग को क्या कहें,जो हिंदी का कमाकर अंग्रेजी में टपर-टपर करता है.....जिसे
> जिसे देश का आम जन कहता है बिटिर-बिटिर....!!
> क्या आप कभी अपनी दूकान से कमाकर शाम को दूकान में आग लगा देते
> हैं.....??क्या आप जवान होकर अपने बूढ़े माँ-बाप को धक्का देकर घर से बाहर कर
> देते हैं....तो हुजुर....माई.....बाप....सरकारे-आला (उच्च)....हाकिम....हिंदी
> ने भी आपका क्या बिगाड़ा है,....वह तो आपकी मान की तरह आपके जन्म से लेकर आपकी
> मृत्यु तक आपके हर कार्य को साधती ही है....और आप चाहे तो उसे और भी
> लतियायें,अपने माँ-बाप की तरह... तब भी वह आखिर तक आपके काम आएगी ही...यही
> हिंदी का
> अपनत्व है आपके प्रति या कि ममत्व ,चाहे जो कहिये ,अब आपकी मर्ज़ी है कि उसके
> प्रति आप नमक-हलाल बनते हैं या "हरामखोर......"??
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क्या हिंदी बदल रही है?
बीबीसी हिब्दी द्वारा कल आयोजित परिचर्चा "क्या हिंदी बदल रही है?" के विषय में जारी सूचना के उपरांत प्रभु जोशी जी से बात हुई और आज उनसे सूचना मिली कि बीबीसी पर उक्त परिचर्चा के लिए प्रश्नोत्तर की रेकार्डिंग हुई है| उक्त परिचर्चा में विशेषज्ञ के रूप में प्रभु जोशी जी को व अन्य कुछ सजग भागीदारों को सुनने के लिए नीचे दिए लिंक पर जाएँ.
परिचर्चा इतनी रोचक व महत्वपूर्ण है कि आप इसे बार बार सुनना चाहेंगे| जोशी जी हमारे समूह हिन्दी-भारत के सम्मानित सदस्य भी हैं व उनके लेखन से हम निरंतर सम्पर्क में रहते हैं| २००७ में जब यह समूह प्रारम्भ किया था तो आरंभिक दिनों में इसी विषय पर केन्द्रित उनके एक लम्बे लेख "इसलिए बिदा करना चाहते हैं हिन्दी को हिन्दी के अखबार" को शृंखला के रूप में समूह के सदस्यों व ब्लॉग पर पाठकों से हमने साझा किया था|
मीडिया प्लेयर चलाने के लिए उक्त लिंक को क्लिक करें -
http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2010/07/100723_indiabol_language.shtml
Vijay K. Malhotra
क्या हिंदी बदल रही है?
पिछले डेढ़ दशक में हिंदी का स्वरूप काफ़ी बदल गया है या फिर इसे जान बूझ कर बदलने की कोशिश हो रही है. कई हिंदी अख़बारों ने तो हिंदी की जगह हिंग्लिश का इस्तेमाल धड़ल्ले से शुरू कर दिया है.
इसके पक्ष में तर्क ये दिया जाता है कि आज की युवा पीढ़ी जैसी भाषा बोलती है वैसी ही भाषा हम सबको इस्तेमाल करनी चाहिए. यानी प्रधानमंत्री की जगह प्राइम मिनिस्टर, छात्र की जगह स्टूडेंट्स और दुर्घटना की जगह एक्सीडेंट!
लेकिन क्या ऐसे प्रयोगों से हिंदी का अस्तित्व बच पाएगा? क्या हिंदी भाषा का ये बदलता चेहरा आपको स्वीकार्य है?
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विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (राजभाषा), रेल मंत्रालय,भारत सरकार
Vijay K Malhotra, Former Director (Hindi), Ministry of Railways, Govt. of India
URL
बीबीसी इंडिया बोल में आयोजित परिचर्चा पर लिखते समय तक कुल ७१ टिप्पणियाँ आईं , देखने के लिए निम्न लिंक पर जाएँ
"क्या हिंदी बदल रही है?"
http://newsforums.bbc.co.uk/ws/hi/thread.jspa?forumID=12241
जहाँ हिंदी भाषी नागरिकों को मारा-काटा या सताया जाएगा और सताने वाले कानून पर भी भारी पड़ते जाएंगे, जहाँ हिन्दी भाषियों को हीन समझा जाएगा या जहाँ हिन्दी लोगों की उन्नति,मान-सम्मान या रोजगार के अच्छे अवसरों की प्राप्ति में बाधक होगी, जहाँ अधिकांश लोग अपने बच्चों को तो अंग्रजी माध्यम में शिक्षा दिलाएंगे और अन्य लोगों को उपदेश हिन्दी का देंगे तो वहाँ भला हिन्दी क्यों नहीं बदलेगी?
सिद्धार्थ कौसलायन आर्य ग्रेटर नौएडा-भारत
यह हमारे लिए अफ़सोस की बात है कि मिलावटी सामान पर तो हाय-तौबा मचाते हैं, पर भाषा में मिलावट करने में हमें गर्व महसूस करते हैं. अगर अंग्रेजी ही बोलनी है तो शुद्ध अंग्रेजी बोलें. यूँ हिंदी में अंग्रेजी मिलाकर बोलेंगे तो गलत असर डालेगी.
Bablu Kolkata
हिंदी का स्वरूप बदलने के किए जा रहे प्रयास कदापि स्वीकार नहीं किए जा सकते. कुछ लोग अपने दिमाग का कचरा हिंदी भाषा पर थोपना चाहते हैं. क्या विश्व में अन्यत्र ऐसी कोई भाषा है जिसे इस प्रकार विकृत किया गया हो? हिंदी के अल्पज्ञान को छुपाने के लिये ये लोग भाषा का स्वरूप ही विकृत करने पर तुले हैं. सभी हिंदी प्रेमी एकजुट होकर इसका विरोध करें.
विनोद शर्मा जयपुर
इसकी कोई आवयश्कता नहीं कि आज के समाचार-पत्र हिंग्लिश भाषा का प्रयोग करें. हिंदी समाचार-पत्र पढ़ने वाले हिंदी अच्छी तरह जानते और समझते हैं. हिंग्लिश के बारे में उनका दिया गया तर्क बेतुका लगता है. हिंदी समाचार-पत्रों का यह दायित्व है कि हिंदी के शब्दों को ही प्रोत्साहन दे, तभी हिंदी बच पाएगी.हिंदी भाषा का यह बदलता स्वरुप हमें कतई स्वीकार्य नहीं.
कृष्णा तर्वे, मुंबई
हमारी भावना, संवेदना, गुस्सा, स्वप्न, सब मातृभाषा में ही प्रकट होते हैं. अंग्रेजी सीखना चाहिए, लेकिन हिंदी के पतन के साथ नहीं. मां कैसी भी हो, बदली नहीं जाती.
नारन गोजिया राजकोट, गुजरात
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From: RAJEEV THEPRA
Subject: Hindi ke prati aap kyaa bananaa chaahenge....namak-halaal....ya haraamkhor.....???
दोस्तों , बहुत ही गुस्से (क्रोध) के साथ इस विषय पर मैं अपनी भावनाएं आप सबके साथ बांटना चाहता हूँ ,वो यह कि हिंदी के साथ आज जो किया जा रहा है ,जाने और अनजाने हम सब ,जो इसके सिपहसलार बने हुए हैं,इसके साथ जो किये जा रहे हैं....वह अत्यंत दुखद है...मैं सीधे-सीधे आज आप सबसे यह पूछता हूँ कि मैं आपकी माँ...आपके बाप....आपके भाई-बहन या किसी भी दोस्त- रिश्तेदार या ऐसा कोई भी जिसे आप पहचानते हैं....उसका चेहरा अगर बदल दूं तो क्या आप उसे पहचान लेंगे....??? एक दिन के लिए भी यदि आपके किसी भी पहचान वाले चेहरे को बदल दें तो वो तो कम , अपितु आप उससे अभिक " "
परेशान "हो जायेंगे.....!!
थोड़ी-बहुत बदलाहट की और बात होती है....समूचा ढांचा ही " रद्दोबदल " कर देना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता.....सिर्फ एक बार कल्पना करें ना आप....कि जब आप किसी भी वस्तु को एकदम से बिलकुल ही नए फ्रेम में नयी तरह से अकस्मात देखते हैं,तो पहले-पहल आपके मन में उसके प्रति क्या प्रतिक्रिया होती है...!!.
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