3.7.17

हिन्दी पर स्वार्थ का हथौड़ा…..!


               दुनिया में एकमात्र स्वाधीन भारत राष्ट्र राज्य है,  जहाँ पर सत्तर साल बीत जाने पर भी  राजनीति का इतना अधिक पराभव हुआ है कि इसकी अपनी राष्ट्रभाषा तक घोषित  नहीं होसकी है। इतिहास गवाह रहेगा कि राजनैतिक स्वार्थ ने भारत को जोड़ने वालीउसकी एकता की वाहकजन-जन के ह्रदय सूत्र के तारों को सशक्त करने वाली भाषा हिंदी को उसकालोकतांत्रिक अधिकार  मिल नहीं सका है। जिस भाषा को महात्मा गांधी ने  स्वाधीनता का वाहक बनाया था। पूरे देश में उन्होंने हिंदी सिखने का आग्रह किया। यही नहीं २९ मार्च १९१८ कोइंदौर में मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति के भवन का सिलान्यास किया और अप्रैल १९३५ में भवन का उद्घाटन किया। इंदौर में उन्होंने आव्हान किया था कि दक्षिण भारत में समिति हिंदीका प्रचार-प्रसार करें। इसके लिए उन्होंने अपने बेटे देवदास गांधी को कार्यकर्ताओं के साथ हिंदी का प्रचार-प्रसार करने के लिए तमिलनाडु भेजते हुए कहा था “एक राष्ट्रएक भाषा के सूत्रको मान लेना चाहिए। प्रांतीय भाषाओं केबिना स्वराज्य अधूरा है।
             २६ जनवरी १९५० को भारत राष्ट्र राज्य सम्प्रभू संवैधानिक गणराज्य घोषित हुआ था। किंतु संविधान सभा के निर्णय अनुसार हिंदी को देश की राष्ट्र भाषा कादर्जा प्रदान नहीं किया गया। प्रावधान कर दिया गया कि पन्द्रह साल की अवधि में सरकार हिंदी को राजभाषा के रूप में सक्षम कर देगी।परंतु सरकार ने संविधान सभा की भावना सम्मान नहीं किया और पन्दह  साल की अपेक्षा सत्रह साल बाद सन १९६७ में बहाना बना लियागया कि हिंदी अभी भी  राजभाषा का स्थान ग्रहण  करने के योग्य नहीं है। राजनीति के क्षुद्र स्वार्थ दुष्परिणाम यह सामने आया कि विदेशीभाषा अंग्रेज़ी सरकार के कामकाज की भाषा अनिश्चितकालतक तक बनी रहेगी।  साथ ही निर्ल्लजता पूर्वक यह प्रावधान कर दिया गया  किदेश के सभी राज्यों में से यदि एक भी राज्य हिंदी के विरोध में रहेगा तो हिंदी राजभाषा का स्थान ग्रहण नहीं कर सकेगी। परिणाम स्वरूपअब सत्तर साल हो गये हैं और अंग्रेज़ी में ही सरकार का कामकाज चल रहा है।
                 विडम्बना यह हुई है कि देश के उच्चत्तम और उच्च न्यायालयों  में हिंदी और राज्यों की भाषाओं में कोई भी वाद चलाया नहीं जा सकता है।  देश में देश की भाषाओं का न्याय केदरवाज़े में प्रवेश निषिद्ध है। हिंदी और राज्यों की भाषाओं के लिए अब एकमात्र रास्ता  संविधान में संशोधन कर दिया जाय। अन्यथा सवा सौ करोड़ नागरिकों की भाषाएं  सरकार केकामकाजन्याय और शिक्षा के क्षेत्र में वंचित ही रहेगी। अत्यंत विचारणीय प्रश्न यह है कि स्वतंत्रता मिलने के बाद भारतीय ज्ञान उपेक्षित हो गया। भारतीय मानस की भारतीयता खोती गयी।यह बौद्धिक उपनिवेशीकरण का प्रभाव रहा। उच्च शिक्षा का ज्ञान और शोध की धारा पश्चिम से आयातित होती आई है। मानसिक दरिद्रता का यह ज्वलंत दृष्टांत है। साक्षात परिणाम राष्ट्र कोयह भुगतना पड़ा कि हमारा देश नोबल पुरस्कारओलम्पिक खेल और गुणवत्ता की शिक्षा के क्षेत्र में विश्व में पिछली क़तार में हैं।
              शिक्षाचिकित्साज्ञान-विज्ञान का क्षेत्र सरकार के बजट में अब तक सतत् उपेक्षित रखा गया है। भारत दुनिया में राष्ट्रभाषा से विहीन एकमात्र राष्ट्र है। जहाँ के जन प्रतिनिधि चुनावतो मतदाताओं की भाषा में बोल कर जीतता है। जीतने के बाद संसद में ग़ुलाम मानसिकता की विदेशी भाषा में बोलते हुए शर्म महसूस नहीं करता है। यही मानसिकता देश के विकास औरराज्यों तथा देश की सर्व व्यापक भाषा हिंदी के मार्ग की बाधा बनी हुई है। राजनीति के अंध स्वार्थ की हद अब यहाँ तक पहुंच चुकी है कि कि राज्यों की बोली जाने वाली बोलियों को हीसंविधान की अष्टम अनुचूची में शामिल करने की धृष्टता की हद पार करने में ज़रा भी संकोच नहीं किया जा रहा है।  परिणाम यह सामने आने वाला है कि हिंदी की अपेक्षा लोग जनगणना मेंअपनी बोली को निश्चित ही लिखावेंगे। हिंदी की स्थिति किसी बोली के समान हो जायगी। दु:खांत हालत यह है कि हिंदीमराठीगुजराती’ कन्नड़तेलुगुमलयालम’ तमिल,उड़ियाबांग्ला,पंजाबीअसमियाकश्मीरी आदि भाषाएँ भी राजनीति का अब तक शिकार रही है और भी ज़्यादा उपेक्षित हो जाने वाली है। हिंदी को सँयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा में शामिल करना तो दूर कीकोड़ी की बात रह जाएगी। हिंदी जब संकुचित हो जाएगी तब दुनिया के लोग इसे सीखने में क्यों रुचि लेंगे।
             अगर हिंदी की हालत दयनीय हो गई तो इसके लिए हिंदी के साहित्यकार हिंदी की संस्थाएँहिंदी के शिक्षकहिंदी के पत्रकारहिंदी भाषीहिंदी भाषी छात्रहिंदी सेवी और हिंदी सेजुड़ा मीडिया पूरी तरह से ज़िम्मेदार रहेंगा इतिहास में दर्ज होगा कि जब हिंदी को क्षति पहुँचाई जा रही थी तब ये सभी हिंदी वाले निष्क्रिय थे। जागते हुए गहरी निंद में सोने का बहाना बनारहे थे। अपने-अपने क्षणिक स्वार्थों में डूबे हुए थे। इतिहास में यह भी लिखा जाएगा कि हिंदी की सच्ची सेवाप्रचार-प्रसार ग़ैर हिंदी भाषियों ने ही किया।
हिंदी और इसकी बोलियों के झमेले की जड़ साहित्य अकादमी के पुरस्कार हैं। यदि सरकार द्वारा साहित्य अकादमी के पुरस्कार और अष्टम अनुसूची बोलियों का रिश्ता समाप्त कर दियाजाए और ये पुरस्तार विशुद्ध रूप से साहित्य के स्तर के आधार पर दिए जाएँभले ही भाषा या बोली अष्टम अनुसूची में हो या नहीं  अष्टम अनुसूची  की सभी भाषाओं को साहित्य अकादमीके पुरस्कार / मान-सम्मान की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया तो बोलियों की आठवीं अनुसूचि में शामिल करने की माँग की सम्पूर्ण हवा निकल जाएगी। तब राजनैतिक दल भी बोलियोंको आठवीं अनुसूचि में शामिल करने से अपने निश्चित ही खींच लेंगे। ऐसा प्रस्ताव/सुझाव/संशोधन  संसद में प्रस्तुत करना राष्ट्रहित में होगा।
          इसके अतिरिक्त  सबसे उत्तम रास्ता यह है कि हिंदी को अष्टम अनुसूची से अलग कर के राष्ट्रभाषा घोषित कर  कानूनी प्रयोजनों केसंप्रेषण हेतु राष्ट्रीय संपर्क भाषा बनाया जाय। तब हिंदी राष्ट्रीय दायित्व का निर्वाह करने को स्वतंत्रसक्षम और समर्थ हो जाएगी।
निर्मलकुमार पाटोदी

लेखक परिचय - निर्मल कुमार पाटोदी - स्वतंत्र टिप्पणीकार सम्पर्क७८६९९-१७०७०

भाषा का महत्व


इतिहास के प्रकांड पंडित डॉ. रघुबीर प्राय: फ्रांस जाया करते थे। वे सदा फ्रांस के राजवंश के एक परिवार के यहाँ ठहरा करते थे।
उस परिवार में एक ग्यारह साल की सुंदर लड़की भी थी। वह भी डॉ. रघुबीर की खूब सेवा करती थी। अंकल-अंकल बोला करती थी।
एक बार डॉ. रघुबीर को भारत से एक लिफाफा प्राप्त हुआ। बच्ची को उत्सुकता हुई। देखें तो भारत की भाषा की लिपि कैसी है। उसने कहा अंकल लिफाफा खोलकर पत्र दिखाएँ। डॉ. रघुबीर ने टालना चाहा। पर बच्ची जिद पर अड़ गई।
डॉ. रघुबीर को पत्र दिखाना पड़ा। पत्र देखते ही बच्ची का मुँह लटक गया अरे यह तो अँगरेजी में लिखा हुआ है।
आपके देश की कोई भाषा नहीं है?
डॉ. रघुबीर से कुछ कहते नहीं बना। बच्ची उदास होकर चली गई। माँ को सारी बात बताई। दोपहर में हमेशा की तरह सबने साथ साथ खाना तो खाया, पर पहले दिनों की तरह उत्साह चहक महक नहीं थी।
गृहस्वामिनी बोली डॉ. रघुबीर, आगे से आप किसी और जगह रहा करें। जिसकी कोई अपनी भाषा नहीं होती, उसे हम फ्रेंच, बर्बर कहते हैं। ऐसे लोगों से कोई संबंध नहीं रखते।
गृहस्वामिनी ने उन्हें आगे बताया "मेरी माता लोरेन प्रदेश के ड्यूक की कन्या थी। प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व वह फ्रेंच भाषी प्रदेश जर्मनी के अधीन था। जर्मन सम्राट ने वहाँ फ्रेंच के माध्यम से शिक्षण बंद करके जर्मन भाषा थोप दी थी।
फलत: प्रदेश का सारा कामकाज एकमात्र जर्मन भाषा में होता था, फ्रेंच के लिए वहाँ कोई स्थान न था।
स्वभावत: विद्यालय में भी शिक्षा का माध्यम जर्मन भाषा ही थी। मेरी माँ उस समय ग्यारह वर्ष की थी और सर्वश्रेष्ठ कान्वेंट विद्यालय में पढ़ती थी।
एक बार जर्मन साम्राज्ञी कैथराइन लोरेन का दौरा करती हुई उस विद्यालय का निरीक्षण करने आ पहुँची। मेरी माता अपूर्व सुंदरी होने के साथ साथ अत्यंत कुशाग्र बुद्धि भी थीं। सब ‍बच्चियाँ नए कपड़ों में सजधज कर आई थीं। उन्हें पंक्तिबद्ध खड़ा किया गया था। बच्चियों के व्यायाम, खेल आदि प्रदर्शन के बाद साम्राज्ञी ने पूछा कि क्या कोई बच्ची जर्मन राष्ट्रगान सुना सकती है?
मेरी माँ को छोड़ वह किसी को याद न था। मेरी माँ ने उसे ऐसे शुद्ध जर्मन उच्चारण के साथ इतने सुंदर ढंग से सुना पाते।
साम्राज्ञी ने बच्ची से कुछ इनाम माँगने को कहा। बच्ची चुप रही। बार बार आग्रह करने पर वह बोली 'महारानी जी, क्या जो कुछ में माँगू वह आप देंगी?'
साम्राज्ञी ने उत्तेजित होकर कहा 'बच्ची! मैं साम्राज्ञी हूँ। मेरा वचन कभी झूठा नहीं होता। तुम जो चाहो माँगो। इस पर मेरी माता ने कहा 'महारानी जी, यदि आप सचमुच वचन पर दृढ़ हैं तो मेरी केवल एक ही प्रार्थना है कि अब आगे से इस प्रदेश में सारा काम एकमात्र फ्रेंच में हो, जर्मन में नहीं।'
इस सर्वथा अप्रत्याशित माँग को सुनकर साम्राज्ञी पहले तो आश्चर्यकित रह गई, किंतु फिर क्रोध से लाल हो उठीं। वे बोलीं 'लड़की' नेपोलियन की सेनाओं ने भी जर्मनी पर कभी ऐसा कठोर प्रहार नहीं किया था, जैसा आज तूने शक्तिशाली जर्मनी साम्राज्य पर किया है।
साम्राज्ञी होने के कारण मेरा वचन झूठा नहीं हो सकता, पर तुम जैसी छोटी सी लड़की ने इतनी बड़ी महारानी को आज पराजय दी है, वह मैं कभी नहीं भूल सकती।
जर्मनी ने जो अपने बाहुबल से जीता था, उसे तूने अपनी वाणी मात्र से लौटा लिया।
मैं भलीभाँति जानती हूँ कि अब आगे लारेन प्रदेश अधिक दिनों तक जर्मनों के अधीन न रह सकेगा।
यह कहकर महारानी अतीव उदास होकर वहाँ से चली गई। गृहस्वामिनी ने कहा 'डॉ. रघुबीर, इस घटना से आप समझ सकते हैं कि मैं किस माँ की बेटी हूँ।
हम फ्रेंच लोग संसार में सबसे अधिक गौरव अपनी भाषा को देते हैं। क्योंकि हमारे लिए राष्ट्र प्रेम और भाषा प्रेम में कोई अंतर नहीं...।'
हमें अपनी भाषा मिल गई। तो आगे चलकर हमें जर्मनों से स्वतंत्रता भी प्राप्त हो गई। आप समझ रहे हैं ना!
प्रस्तुति- मोहन गुप्ता

14.8.15

चाचा की फेसबुक में चाची-6


डॉ. भानु प्रताप सिंह
चाची अनामिका ने ठान लई कि वो अपने ‘उनकी’ और मेरे चाचा अनार सिंह की मन की बात जानिकैं रहैगी। याई मारें चाची मेरे ढिंगा आई और कहन लगीं- लल्ला, नैंक फेसबुक तो खोलिओं। देखूं तो सही, तुमाए चाचा कौन-कौन के संग गुलछर्रे उड़ाय रएं और कौन-कौन सी छोरिन कूं पारटी दै रएं। 
चाची की बात सुनिकैं मैं समझि गौ कि अब चाचा पै अब बेभाव परिंगे। चाचा कूं कोऊ बचाय नांय पाबैगौ। चाचा ने पढ़िबे के पीछें बचपन में मेरी भौत पिटाई करी है, मैं तो चाहतूं कि चाचा की सारी पोलपट्टी खुलि जाए। मैं मन ई मन बड़ौ खुस भयो, लेकिन चाची कूं दिखाइबे कैं मारें बोलो- चाची, तुम कौन से चक्कर में पर रइयो। आदमिन कौ तो कामु है छोरिन कूं पटानौ। छोरी पटि गई तौ ठीक है, नांय पटी तो राम-राम। तुम देखि नांय रईं का लोकसभा में मोदी सरकार सोनिया गांधी कूं पटाइबे में लगी भई है। बे नांय मान नईं, तो हल्ला-गुल्ला मचि रौ ए।
चाची: तौ तुमने का मोय सोनिया गांधी समझि लौ ए।  मैं तो भौत सीधी-सादी हूं।  मोय हल्लौ-गुल्ला ते का कन्नौए। सोनिया तो ‘पप्पू’ की मम्मी हैं।  पप्पू के चक्कर में सोनिया गाँधी कूं कितनी सुननी पत्तै। सोनिया के घरवाले तो प्रधानमंत्री हते और हमारे मंत्री तक नानैं।
मोय लगी कै कछू गल्त बात कै दई। मैंने बात संभाली: अरे, चाची, तुम तो सुषमा स्वराज हौ। भारतीय नारी।
चाची: लल्ला, तुम फिर मेरौ दिमाग खराब कररए हौ। सुषमा कूं देखि लेउ। मुए ललित के चक्कर में सुषमा ने अपनी इमेज पै कालिख पोत दई। इत्तौ तौ मैं जान्तूं कि  लोकसभा में हंगामौ सुषमा के चक्कर में है रयौ है। खैर, मोय या ते का कन्नौऐ। मोय तो अपनौ घर देखनौ है। तुमाए चाचा कूं बिगड़ि बे ते बचानौ है।
मैंने कई: चाचा कूं बिगड़ि बे ते बचानौ है या तुम याइ देखि कैं घबराय रईयौ कि चाचा हाथ से निकरे जाइ रए हैं। सुंदर-सुंदर छोरी चाचा कूं लाइन मारि रई हैं, या चक्कर में तुमाई लाइन कटि सकतै।
चाची: मेई लाइन कोई नांय काटि सकतु। सांप कित्तौऊ टेढ़ौ चलै लेकिन बिल में तौ सीधौ ही घुसैगो। एक कहावत तो लल्ला तुमन्नै जरूर सुनी होयगी कि हड्डी देखि कैं कुत्ता की जीभ लपलपान लगतै। जब सब छोरी फेसबुक पै ‘पूनम पांडे’ बनिबे कूं तैयार बैठी है तो आदमी का करैगौ।
मैंने कई- चाची ऐसी बात नांय। तुम मोइये ले लेउ। मेरे सामने कितनीऊ सुंदर छोरी खड़ौ कद्देउ। मेरे मन में ऐसी-वैसी बात नांय आबैगी। रहीमदास जी ने कही है न- जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग, चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग। सारी बात चरित्तर की है। जाकौ चरित्तर अच्छौ है, बाकूं सुंदर छोरी से कोई फरक नांय पत्तु।
चाची: हां, जे बात तो सई है। मोय लगि रई है कि तुमाए चाचा कौ डीएनए ही खराबु है। डीएनए टेस्ट है जाय तो सब मालूम पज्जाइगी।
चाची कूं मोदी की भाषा में बात कत्तु देखि कैं मेरौ तो माथौ घूमि गौ। मैं समझि गौ कि चाची कूं मूरख बनानौ आसान नानै।

चाचा की फेसबुक में चाची-5


डॉ. भानु प्रताप सिंह
जैसौ कि तुम पैले तेई जान्तओ कि चाचा अनामिका बनि कैं चाचा अनार सिंह की फेसबुक में घुस गई है। चाचा की फ्रेंडलिस्ट में 290 छोरिन कूं देखिकैं चाची का माथौ घूमि गौ। चाची न जाने का-का सोचिबे लगि गई। चाची द्वै दिनन बाद मेरे ढिंगा आई और बोली- लल्ला का कररएओ?
मैंने कई- कररौ तो कछू नांय, पर तुम जे बताओ कि द्वै दिनन बाद आई हो। पैलैं तो रोज आय रईं। चाचा से झगड़ौ है गयो का।
मेरी बात सुनिकैं चाची बोली- ऐसी कोऊ बात नांय लल्ला। हां, तुमाए चाचा की फेसबुक में द्वै सौ नब्बे छोरिन कूं देखि कैं मेरा दिमाग खराब है गौए। मैं समझि नांय पाय रई कि या कौ का इलाज करूं। छोरिन के पीछें पागल है गएं तुमाए चाचा।
मैंने बोलौ- अरी चाची, या मैं दिमाग खराब करिबै की कौन सी बात है। फेसबुक में तो सब चल्तुए। छोरिन से बात करिकैं नैंक दिमाग फिरेश हो जातुए।
चाची- बात दिमाग फिरेश करिबे की नांय। जब ते तुमाए चाचा ने फेसबुक आईडी बनाई है, तब से रात में देर तक जागें। मोय लगि रई है जे छोरिन ते ई बात कत्त रैतएं। छोरिन कूं तो ‘स्वीट हार्ट’ कैबैं और मोपे झल्लातएं। वैसें, फेसबुक पै लाइन मार रए हैं। हे भगवान, तुमाई जे कैसी लीला है।
मैंने आग में घी डारौ और बोलो- चाची, ये लीला भगवान की नांय, चाचा की है। चाचा तो पूरै लीलाधर हैं। तुम देखौ न, छोरी 290 और चाचा अकेले। चाचा तो रासलीला कररए हैं। मोय तो ‘दार में कारौ’ लगि रौ है।
चाची: हां, लल्ला। तुम सई कै रए हौ। फेसबुक पै ई रासलीला है जाय रई है तो मेरे ढिंगा आय कैं का करिंगे। मोय तो आजकल ठीक चौं नांय देखि नांय रए, जे बात अब मेरी समझ में आय रई है।
मैंने लोहा गरमु देखि कैं चोट मारी: अच्छा, चाची दे बताओ कि चाचा ने तुमन्नैं साड़ी कब तें लाय के नांय दई?
चाची: लल्ला,सात-आठ महीना है गए। पै लें तो हर महीना कछू न कछू लात रैत ए। अब तो घर मेंं खाली हाथ आबतें।
मैंने चाची के कान में कूं करी: चाची, जे पैसा कां जाइरौए। जरूर फेसबुक की छोरिन पर खच्चु है रौए। चाचा छोरिन कूं पारटी देत हुंगे। याई मारें तुमन्नै कछू नांय लाय रए।
चाची: पर लल्ला, फेसबुक पै छोरिन को पतौ तो लिक्खौ नांय, फिर होटल में पारटी कैसैं है जाइगी।
मैंने कई: चाची, तुम बड़ी भोली हो। फेसबुक पै चैटिंग-फैटिंग कत्त-कत्त एक दूसरे कौ मोबाइल नम्बर लै लेत एं। फिर काऐ, कऊएं मिल लेउ।
चाची: या मैं गल्ती तो तुमाए चाचा की है। अपनौ मोबाइल नम्बर छोरिन कूं चौं दै रए हैं। या कौ मतलब जे भयो कि तुमाए चाचा के मन में जरूर कछू खोट है। अपनी लुगाई कूं छोड़ि कैं काऊ और कूं पारटी दैनो कोई अच्छी बात नांय। अब मोइयै कछू कन्नौ परैगौ।
चाची की बात सुनिकैं मैं मन ई मन भौत खुस भयौ कि चाचा कूं अब मालूम परैगी। 

चाचा की फेसबुक में चाची-4




डॉ. भानु प्रताप सिंह

मोय लगि रौए कि चाची कूं फेसबुक को चस्का लगगौ। तबई तौ मोते बेर-बेर पूछती रैबें- लल्ला कब तक फ्री हुंगे। मेरो पढ़िबे में मन नांय लगे पर फेसबुक में तो मैं ऊ घुसो रऊं। चाची ते तो मैं या ई कैतो कि अबई पढ़ि रौ ऊं। थोरी देर में बतांगो।  चाची कूं फेसबुक की हुड़क लग गई। चाचा तौ भंडाफोड़ करिबे कूं तैयार बैठी। या मारें चाची कूं नैकऊ चैन नां पररो। थोरी देर बाद चाची ने फिर पूछी- खाली है गए का लल्ला। मैंने कई- हां, चाची, अब मैं खाली हूं। चाची मुस्काबत भई बोली- फेसबुक खोलो। मोय नैंक जे बताओ कि तुम्हाए चाचा कौन-कौन सी छोरिन से बात कत्तएं।
मैने कई- जे कौन सो बड़ौ काम है।  चाचा की फ्रेंडलिस्ट से सब मालूम पज्जाइगी। मैंने चाची कूं बताई- चाचा की फ्रेंडलिस्ट में 420 जने हैं। इनमें 290 छोरी हैं। चाची ने ये बात सुनी तो चौंक गई। फिर बोलीं- कछुन के नाम तो बतइयों लल्ला। मैंने नाम गिनाए- रुखसाना, करीना, माहिरा खान, पूजा हेगड़े, कृति सैनन, अक्षरा हसन, रिद्धिमा सूद, सपना पब्बी, मधुरिमा तुली, तापसी पन्नू, हुमा कुरैशी, पूनम पांडे, भूमि पेडनेकर, सिद्धि, आसमां,  सोनाक्षी सिन्हा, ...।
‘इनके बारे में कछु बताओ तो सही।’ चाची ने कही।
‘अरे, चाची तुमन्नै का बताऊं। जे तो टाप ऐं टाप। इन छोरिन पै तो कोऊ लट्टू है जाबैगो। चाचा लट्टू है गए तो कोऊ बड्डी बात नानै।’
चाची बोली- ऐसी इनमें ऐसी का बात ए।
मैंने कई: चाची, तुम का जानौ। जब ये मुस्काबतें न, तौ हीया हिल-हिल जाबै। जे छोरी जैसौ कपड़ा-लत्ता पहन लेतएं, बोई फैसन बन जातुए।
चाची: अच्छा। पूनम पांडे तो बोई है न जो निमंग नंगी है जातै। याई ने तो कई कि इंडिया की टीम जीत जाइगी तो नंगी है जाइगी। तो लल्ला तुम जे बताओ कै नंगो है जाइबो फैसनु होतु है का।
चाची ने जब पूनम पांडे को नाम लयो तो मेरो माथो घूमि गौ। दिमाग में तरह-तरह की पिक्चर चलिबे लगीं। मोय लगो कि पूनम पांडे मोय देखि कैं मुस्काइ रई है। मैंने फौरन अपनी सिर झटकौ और चाची ते कई- चाची, आजकल नंगन कौ जमानौ है। पूनम पांडे नंगी है गई, तो हम बाके बारे में बात करि रए हैं। अगर नंगी न होती तो बाय कौन पूछिरो। संसद में सांसद नंगी-नंगी बात कररएं। भ्रष्टाचार पर लम्बौ-लम्बौ भाषण झाड़िबे बारे मौंह पे अलीगढ़ कौ तालौ मारि कैं बैठि गएं, ये ऊ तो नंगई है। वैसें तो हमाम में सब नंगे हैं पर हमाए नेता तो हमाम के बाहरऊ नंगे हैं। फेसबुक पै ऊ नंगई चल रई है।
चाची ने मेरी हां में हां मिलाई और लम्बी सांस भरिकैं बोलीं- सही कै रएऔ लल्ला। अपने चाचा कूं देखि लेउ। इनते जादा नंगो कौन मिलैगो। फेसबुक में मोय ‘अनामिका’ समझि कें पटाय रए हैं। सादीसुदा हैं, पर कुट्टु कुंआरे बने फिर रए हैं। इन छोरिन के चक्कर में नंगपनो करिबे लगगएं। जब मोय ब्याहि के लाएं, तब ऐसे नाए। तब तो मोय छोड़िकें काऊ कूं आँख उठाय के नांय देखते। जब तें फेसबुक के चक्कर में परे हैं, तब ते नंगपनो सीख गएं।

चाचा की फेसबुक में चाची-3

डॉ. भानु प्रताप सिंह

जुगाड़ करि कराय कें चाची अनामिका बनकर चाचा अनार सिंह की फेसबुक में घुस गई। दोउन में चैटिंग-फैटिंग होने लगी। चाची साम कूं मेरे ढिंगा आई और बोली- नैक देखियों लल्ला, फेसबुक पर का है रौए। मैंने चाची की फेसबुक आईडी खोली तो बा पे चाचा की ओर से हैलो.. हैलो डियर, कहां हो, बिजी हो लिखा हुआ था। मैंने कही चाची, लोहौ गरमु है। बताओ, का लिखनौ ऐ। अब चाची बताय जात रई और मैं लिखत जात रयो।
चाची: हैलो जी।
चाचा: मिस्ड यू टू मच।
चाची: मैं ऊ तुमन्नै मिस कर रई। मम्मी खर्राटे भर रई हैं, तो मैं बात कर पाय रई हूं।
चाचा: मम्मी सोय गईं, गे तो भौत अच्छो भयो। अब हम खुलिकें बतिया सकें।
चाची: चौं नाय,  खुलिकेंईं बात होनी चइयें।
चाचा: मैं पूछिरो, कल्लि मेरी याद आई कै नाय। सच्ची बतइयों।
चाची: याद तो भौत आई। तुम भौत अच्छे हो। नैंक ये तो बताओ कि तुम मेरे बारे में का सोचतौ।
चाचा: तुम तो चौदवीं कौ चांद हो। तुमाए लएं तो अमिताभ बच्चन ने गानौ गायो है- ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना..
चाची: ज्यादा फैंको मती। तुम लड़के ऐसे गानौ सुनायं को छोरिन की पटाय लेतओ और अपनो काम  निकार के छोड़ देतओ। मन्नौ तो छोरिन को है जातुए। 
चाचा: जे तुम सही बात कै रईओ। आजकल्लि के छोरा ऐसेई हैं। तुम मो पै बिस्वासु करिकें देखो।
चाची: चलौ कल्लौ बिस्वासु। अब का कैनोए।
चाचा: तुमन्नै मो पै बिस्वासु कल्लौ, अब मोय कछू नाय चइयैं। अगर तुम मिल जाओ, जमाना छोड़ि देंगे हम...
चाची: तुम फिर फैंकिबे लगे। अच्छा ये बताओ, तुम इतने अच्छे हो, तोऊ सादी चौं नाय करी। तुमन्नै तो भौत छोरी मिल जाइंगी।
चाचा: छोरी तो मुकती हैं, लेकिन मोय ऐसी चंइये, जो तुम्हारे जैसी टनाटन हो। सच्ची बताइ रौऊं, रात में तुम सपने में आत रहीं। सपनों की रानी बन गई हो तुम तो।
चाची: अच्छा..  मोय बैलाइकें अपनी काम निकान्नौ चाहो। तुमाई फ्रेंड लिस्ट में तो भौत छोरी हैं। मेरे अलावा और कौन-कौन कूं सपनों की रानी बताय चुके हो।
चाचा: जे का कै रइयौ। अगर तुम मो पै सक करि रई तो मैं सबन कूं अनफ्रेंड कद्दंगौ। सब छोरी तुमाए पांवन की धूल लगें।
चाची: अच्छा, तुमन्नै मेरे पांव ऊ देख लए। और का-का देखिबे कौ इरादौ है।
चाचा: जो तुमाई मरजी होयगी...
चाची: अब तुम बदमासी कररए हो। ऐसी बात करौगे तो मैं तुमन तो बात नाय करुंगी।
चाचा: अरे, तुम तो बुरौ मान गईं। मैं तो मजाक कररौ। मैं याय बात कूं अच्छी तरह जानतूं कि तुम भौत दिलखुश हो। तुम तो जा घर में जाओगी बाय सुरग बनाय दोगी। 
अब चाची ने मोते कई, देख लई लल्ला। तुमाए चाचा कैसे पटाय रएं ‘अनामिका’ कूं। अगर मो ते इत्ते प्यार से बात कत्त रैबें तो मैं अपनी जानए दे दुंगी। मोते कबऊं नांय बताओ सपनों का रानी। मोते कबऊं नांय कई- चौदवीं कौ चांद। मन में तो ऐसी आय रई है कि तुमाए चाचा की चांद फोर दऊं। मैंने सलाह दई- चाची चांद नांय, चाचा कौ भंडा फोड़ो भंडा।

चाचा की फेसबुक में चाची-1

डॉ. भानु प्रताप सिंह
 ‘ए लल्ला, कछू काम कर रएओ का’, चाची ने मोते बड़े प्यार ते सवाल करौ तो मैं चक्कर में परिगौ।
मैंने अपनी नजर मोबाइल की स्क्रीन पर टिकाय रखी। व्हां से नजर हटाए बिना बोलौ- ‘नांय चाची, कुछ खास काम नाएं। मैं तो ऐसेईं मोबाइल देख रौऊं।’
‘अच्छा, एक बात बताओगे सही-सही। झूठ तो नांय बोलोगे।’
चाची कौ सवाल सुनि कैं मोय सबरी छोरिन के चेहरा याद आय गए। मैं मन ई मन में सोचिबै लगौ, चाचीये कैसै पतौ परि गई। जरूर भोलू ने कई होयगी। अबई तो प्रेमकहानी ठीक तै सुरू नाय है पाई और सबकूं खबर लगि गई। अब का होयगौ। चाची ने अगर पापा कूं बताय दई तो भौत मार परैगी। मैं मार परिबे की सोच कैं ई  कांपिबै लगि गौ। लगतौए  चाची ने मेरी हालत देख लई हती, तबई तो बोलीं- ‘का भयौ लल्ला, इत्ते परेसान से चौं है गए।’
मैंने अपनी परेसानी छिपाई और बोलौ- ‘नांय चाची, ऐसी कोई बात नाएं। तुम बताओ, का पूंछ रईं।’
‘लल्ला, मैं पूछि रई कि जे फेसबुक का हौबै?’ चाची को सवाल सुनिकैं मैं फिर चौंक गौ।
‘अरे, चाची तुम्हें का कन्नौ या फेसबुक ते।’ मैंने चाची को टारिबे की नीयत से बात कही।
‘नांय लल्ला, मोय बताओ और सच्ची-सच्ची बताई। तुम्हें विद्यारानी की कसम है।’ चाची ने अपनौ हक जमात भये अपनी बात कही।
‘चाची, फेसबुक कछू नांय। जे तो छोरा-छोरिन के चौचले हैं। जिन पै फालतू टैम होतुए न, वो छोरा -छोरी आपस में बात कत्त रैतएं और उनके टैम कटि जातुए।’ मैंने चाची कूं समझाएबे के अंदाज में पूरी बात बताई। फिर मैंने पूछी- ‘चाची तुम्हें का कन्नौए फेसबुक ते। फेसबुक के चक्कर में तुम इतनी परेसान चौंऔ।’
मेरी बात सुनिकैं चाची की आंखिन में पानी आय गौ। अपनी नजरें नीचीं करकैं बोलीं- ‘लल्ला, बात जे ए कि तुम्हारे चाचा रात में लैपटॉप पर बिजी रैवें। एक दिन मैंने पूछी तो कहन लगे कि आफिस कौ काम है। कल्लि मैं तुम्हारे चाचा कूं दूध दैबे गई तो मेरी नजर लैपटाप पै परि गई। बा पै फैसबुक लिखी आय रई। तमाम छोरिन के फोटू दिखाई दए। फोटुन में छोरी बेसरमन की तरह मौं फारि के हँस रईं। मोय तो कछु गड़बड़ लगि रई है।’
चाची की बात सुनि कैं मैं हँसे बिना नांय रै सकौ। मैंने कई- ‘चाची, या मैं परेसान है बे की कोई बात नांय। फेसबुक पै तो मैं ऊ हतूं।’
‘तुम्हाई बात और है लल्ला। तुम्हारे चाचा की बात और है। आजकल की छोरिन की नैकई भरोसौ नांय। जगह-जगह मौंह मात्ति फित्तैं। तुम्हारे चाचा ऊ कछु कम नांय। कछु करौ लल्ला। ’
चाची की बात सुनिकैं मैं पसीज गौ। मैंने चाची की ‘अनामिका’ के नाम ते फेसबुक आईडी बनाय दई है। चाचा ने फ्रेंड रुकेस्ट स्वीकार लई है। अब चाची, चाचा की फेसबुक पर दोऊ दीदा लगाय कें देखती रैबें।