12.4.10

भानु प्रताप ने शुरू की पत्रिका समूह संग नई पारी
Wednesday, 07 April 2010 15:00 B4M भड़ास4मीडिया - प्रिंट

डा. भानु प्रताप सिंह
हिंदुस्तान अखबार में शीर्ष संपादकीय नेतृत्व बदलने के बाद से उपेक्षा का दंश झेल रहे भानु प्रताप सिंह ने नई पारी की शुरुआत कर दी है. उन्होंने पत्रिका ग्रुप ज्वाइन कर लिया है. उन्हें आगरा व अलीगढ़ मंडल का ब्यूरो चीफ बनाया गया है.
वे आगरा में ही बैठेंगे. पत्रिका ने यह नियुक्ति ग्वालियर में अपना एडिशन शुरू करने के क्रम किया है. मृणाल पांडेय के समय में भानु हिंदुस्तान, आगरा के लिए अप्वाइंट हुए थे. बाद में उन्हें अलीगढ़ का ब्यूरो चीफ बना दिया गया था. इस बीच, जब शशि शेखर एंड कंपनी हिंदुस्तान में आई तो पुराने लोगों की उपेक्षा का जो दौर शुरू हुआ, उसमें भानु भी शामिल कर लिए गए. भानु को अलीगढ़ से हटाकर आगरा बुला लिया गया और एक तरह से साइडलाइन कर छोड़ दिया गया. इससे आजिज आकर भानु ने इस्तीफा दे दिया. नौकरी छोड़ने के बाद अध्ययन -अध्यापन में जुटे डा. भानु ने फिर से आगरा में ही देश के प्रतिष्ठित अखबार समूहों में से एक पत्रिका ग्रुप के साथ नई पारी की शुरुआत कर दी है.
डा. भानु 20 वर्षों से पत्रकारिता में हैं. वे हिंदुस्तान, आगरा और अलीगढ़ की लांचिंग कोर टीम के सदस्य रहे हैं. आगरा में वे दैनिक जागरण व अमर उजाला, दोनों अखबारों के साथ लंबी पारी खेल चुके हैं. राष्ट्रीय सहारा में भी काम कर चुके हैं. एमबीए के बाद प्रबंधन विषय में हिंदी माध्यम से पीएचडी करने वाले भानु की 3000 से अधिक बाईलाइन खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं. भानु की लिखी चार किताबें जल्द ही प्रकाशित होने वाली हैं.
Comments (22)
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...written by chaman sharma, April 07, 2010
Best of luck BHANU bhai sahab
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...written by Ajay , April 08, 2010
कुछ धुरबाजों को अफसोस तो बहुत हुआ होगा लेकिन भानु जी जैसे व्यक्ति इस सबसे ऊपर उठ चुके हैं.. आगरा के लोग उनकी लेखनी को लम्बे समय से मिस कर रहे थे.. अब उनकी कलम का कमाल दुनिया देखेगी.. !
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...written by Naseem faruki, April 08, 2010
Dear Bhanu ji ek patrakar ki sabse badi peeda hai uski upeksha ak samay ke baad journalist ki chahat hoti hai ki use ek mukaam mile aapne bahut aacha kiya. patrika group me aap ke saath nyaya hoga. Chhattishgarh me patrika group jaldi aaye ye hamari ekcha hai.
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...written by d-waker, April 08, 2010
asha hi nahi viswhas hai ki aap jaise loog patrika ko or adhik bulandi per lejayenge. apko or patrika ko shubhkamnaye- d-wakar
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...written by rajeev tiwari, April 08, 2010
welcome in agra. we wer missing yoy in agra. hope we will read good stories again.
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...written by little, April 08, 2010
kisi bhi akhbar me rahiye, agra me rahiye. ap jahan, hum wahan.bhanu bhai hume apka lambe samay se intzar tha.
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...written by garima, April 08, 2010
bhanu bhai apne to kamal hi kar diya. ap jaise journlist ki agra me hi jarurat h. hindustan ko agra me jamane ke liye apne bahut mehnat ki thi. hume to hindustan ka jabardasti grahak banaya tha.
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...written by shildhar, April 08, 2010
aise hi aage badhte rahiye sir. lekin hume yaad jarur rakhiyega. badhai
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...written by deoki, April 08, 2010
congratulation dear. ap aki lekhni ko nation me jana jayega.
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...written by kk goyal, April 08, 2010
best of luck bhanuji, sorry dr bhanuji. hope you will creat best. agra needs you. kk goyal
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...written by abhinav, April 08, 2010
welcome in agra bhanuji.
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...written by harikant, April 08, 2010
very good, again in agra. patrika is rich now.
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...written by dr vm katoch, April 08, 2010
hurrey, meet u soon.
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...written by yatish lavania, April 08, 2010
Indian photo journlist ki taraf se nai pari ki shuruat ko badhai.
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...written by Deepak Mishra, April 08, 2010
Many congratulations Bhanu ji.
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...written by dr bhanu pratap singh, April 09, 2010
shubhchintakon ka dil se abhaaaaaaaaaaaaaaar. dr bhanu pratap singh
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...written by satendra kulshrrshtha, April 09, 2010
best of luck sir....dhamake ke sath nyi pari ka aagaj kariye.........
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...written by Manisha Upadhaya, April 09, 2010
supj ko rosni ki jrurat nahi hoti h bhanu h roshan to hona hi tha koi grahan bhanu ko nahi chhipa sakta h
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...written by manoj mishra, April 10, 2010
badhai ho nai pari ke liye
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...written by Rishabh K Jain, April 11, 2010
Bhanu ji Aapko Patrika join karne ki Subhkamnay -rishabh jain, Agra
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...written by Rishabh K Jain, April 11, 2010
Bahut Top Bhanu Ji
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...written by Ashok bansal, April 11, 2010
Bhanu ko me janata hun. Honest and Hard working. Struggle kiya hai. Aage jayange. Ashok Mathura

28.3.09

जारी है हिन्दी की सहजता को नष्ट करने की साजिश*

चिन्मय मिश्र*नई दिल्ली, 13 सितम्बर (आईएएनएस)। मुक्तिबोध के एक लेख का शीर्षक है ''अंग्रेजी जूते में हिंदी को फिट करने वाले ये भाषाई रहनुमा।'' यह लेख उस प्रवृत्ति पर चोट है जो कि हिंदी को एक दोयम दर्जे की नई भाषा मानती है और हिंदी की शब्दावली विकसित करने के लिए अंग्रेजी को आधार बनाना चाहती है।भाषा विज्ञानियों का एक बड़ा वैश्विक वर्ग जिसमें नोम चॉमस्की भी शामिल हैं हिंदी की प्रशंसा में कहते हैं कि यह इस भाषा का कमाल है कि इसमें उद्गम के मात्र एक सौ वर्ष के भीतर कविता रची जाने लगी, परंतु वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि पिछले एक हजार वर्षो से अधिक से भारत में हिंदी का व्यापक उपयोग होता रहा है। अपभ्रंश से प्रारंभ हुआ यह रचना संसार आज परिपक्वता के चरम पर है।अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व ही हिंदी की उपयोगिता सिद्ध हो चुकी थी। तत्कालीन भारत विश्व व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण भागीदार था अतएव यह आवश्यक था कि इस देश के साथ व्यवहार करने के लिए यहां की भाषा का ज्ञान हो। गौरतलब है कि अंग्रेजी को विश्वभाषा के रूप में मान्यता भारत पर इंग्लैंड द्वारा कब्जे के बाद ही मिल पाई थी।दिनेशचंद्र सेन ने हिस्ट्री ऑफ बेंगाली लेंगवेज एंड लिटरेचर (बंगाली भाषा और साहित्य का इतिहास)नामक पुस्तक में लिखा है 'अंग्रेजी राज के पहले बांग्ला के कवि हिंदुस्तानी सीखते थे।' इसी क्रम में वे आगे लिखते हैं 'दिल्ली के मुसलमान शहंशाह के एकछत्र शासन के नीचे हिंदी सारे भारत की सामान्य भाषा (लिंगुआ फ्रांका) हो गई थी।'हिंदी की व्यापकता के लिए एक और उदाहरण का सहारा लेते हैं। इलाहाबाद स्थित संत पौलुस प्रकाशन ने 1976 में 'हिंदी के तीन आरम्भिक व्याकरण' नामक ग्रंथ का प्रकाशन किया। ये तीनों व्याकरण हिंदी भाषा के हैं और सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में विदेशियों द्वारा लिखे गए थे। इन व्याकरणों से खड़ी बोली हिंदी के प्रसार और उसके रूपों के बारे में बहुत दिलचस्प तथ्य हमारे सामने आते हैं। इनमें पहला व्याकरण जौन जोशुआ केटलर ने डच में 17वीं के उत्तरार्ध का है।केटलर पादरी थे और उनका संबंध डच (हालैंड) ईस्ट इंडिया कंपनी से था। इसमें भाषा की जिस अवस्था का वर्णन है वह16 वीं सदी के उत्तरार्ध की है। दूसरा व्याकरण बेंजामिन शुल्ज का है जो 1745 ई. में प्रकाशित हुआ था। इसका विशेष संबंध हैदराबाद से था, इसलिए उनकी पुस्तक को दक्खिनी हिंदी का व्याकरण भी कह सकते हैं। तीसरा व्याकरण कासियानो बेलागात्ती का है और इसका संबंध बिहार से विशेष था।यहां पर एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य पर गौर करना आवश्यक है कि तीनों व्यक्ति पादरी थे। वे यूरोप के विभिन्न देशों से यहां आए थे और ईसाई धर्म का प्रचार ही उनका मुख्य उद्देश्य भी था। इसमें से दो व्याकरण लेटिन में लिखे गए और तीसरे का लेटिन में अनुवाद हुआ। तब तक अंग्रेजी धर्मप्रचार की भाषा नहीं थी न ही वह अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त कर पाई थी।ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये तीनों पादरी नागरी लिपि का भी परिचय देते हैं और बेलागात्ती ने अपनी पुस्तक केवल इस लिपि का परिचय देने को ही लिखी है। अपनी बात को और विस्तार देते हुए डा. रामविलास शर्मा लिखते है 'पादरी चाहे हैदराबाद में काम करे, चाहे पटना में और चाहे आगरा में, उसे नागरी लिपि का ज्ञान अवश्य होना चाहिए।' यह बात 17 वीं व 18 वीं शताब्दी की है।बेलागात्ती हिंदुस्तानी भाषा और नागरी लिपि के व्यवहार क्षेत्र के बारे में लिखते है, 'हिंदुस्तानी भाषा जो नागरी लिपियों में लिखी जाती है पटना के आस-पास ही नहीं बोली जाती है अपितु विदेशी यात्रियों द्वारा भी जो या तो व्यापार या तीर्थाटन के लिए भारत आते हैं प्रयुक्त होती है।' 1745 ई.में हिंदी का दूसरा व्याकरण रचने वाले शुल्ज ने लिखा है '18 वीं सदी में फारसी भाषा और फारसी लिपि का प्रचार पहले की अपेक्षा बढ़ गया था।पर इससे पहले क्या स्थिति थी? इस पर शुल्ज का मत है 'समय की प्रगति से यह प्रथा इतनी प्रबल हो गई कि पुरानी देवनागरी लिपि को यहां के मुसलमान भूल गए।' इसका अर्थ यह हुआ कि इससे पहले हिंदी प्रदेश के मुसलमान नागरी लिपि का व्यवहार करते थे। जायसी ने अखरावट में जो वर्ण क्रम दिया है, उससे भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। मुगल साम्राज्य के विघटन काल में यह स्थिति बदल गई। हम सभी इस बात को समझें कि हिंदी एक समय विश्व की सबसे लोकप्रिय भाषाओं में रही है और उसका प्रमाण है भारत का विशाल व्यापारिक कारोबार। जैसे-जैसे मुगल शासन शक्ति संपन्न होते गए वैसे-वैसे भारत का व्यापार भी बढ़ा और हिंदी की व्यापकता में भी वृद्धि हुई थी।क्या इसका यह अर्थ निकाला जाए कि किसी देश की समृद्धि ही उसकी भाषा को सर्वज्ञता प्रदान करती है। भारत व इंग्लैंड के संदर्भ में तो यह बात कुछ हद तक ठीक उतरती है। हिंदी जहां व्यापार की भाषा रही, वहीं उसका दूसरा स्वरूप आजादी के संघर्ष में भी हमारे सामने आता है। महात्मा गांधी ने जिस तरह हिंदी को देश की भाषा बनाने का उपक्रम किया उसने एक बार पुन: हिंदी को वैश्विक परिदृश्य पर ला दिया था । गांधी की भारत वापसी के पश्चात का काल हिंदी की पुनर्स्थापना का काल भी रहा है। वैसे इसका श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र को दिया जाना चाहिए, जिन्होंने लिखा था -निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति कौ मूल।बिनु निजभाषा ज्ञान के, मिटै न हिय कौ शूल।इस पर पं.हजारी प्रसाद द्विवेदी की बहुत ही सागरर्भित टिप्पणी है। वे लिखते हैं, 'उन्होंने निज भाषा 'शब्द का व्यवहार किया है, 'मिली-जुली', 'आम फहम', 'राष्ट्रभाषा' आदि शब्दों को नहीं। प्रत्येक जाति की अपनी भाषा है और वह निज भाषा की उन्नति के साथ उन्नत होती है।' इसी परम्परा के विस्तार को वे हिंदी का जन आंदोलन की संज्ञा भी देते हैं।आजादी के संघर्ष के दौरान ही पढ़े-खिले समुदाय का एक वर्ग अंग्रेजी को 'आभिजात्य' भाषा के रूप में स्वीकार कर चुका था। भारत की आजादी के पश्चात यह आभिजात्य वर्ग एक तरह के पारम्परिक 'कुलीन वर्ग' में परिवर्तित हो गया और उसने अपनी कुलीनता को ही इस देश की नियति निर्धारण का पैमाना बना दिया। इस दौरान षड़यंत्र के तहत हिंदी-उर्दू और हिंदी बनाम भारत की अन्य भाषाओं का मुद्दा अनावश्यक रूप से उछाला गया। ध्यान देने योग्य है कि मुगलकाल तक, जब हिंदी पूरे देश में व्यवहार में आ रही थी तब भी बंगला, तमिल, उड़िया तेलुगु जैसी भाषाएं अपने अंचलों में पूरे परिष्कार से न केवल स्वयं को संवार रही थीं बल्कि अपनी संस्कृति का निर्माण भी कर रही थीं।इस संदर्भ में हिंदी पर यह आरोप भी लगता है कि हिंदी की सबसे बड़ी विफलता यह है कि वह अपनी संस्कृति विकसित नहीं कर पाई, परंतु ध्यानपूर्वक अध्ययन से ऐसा भी भान होता है कि संभवत: हिंदी को कभी भी अपनी पृथक संस्कृति निर्मित करने की आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई होगी। अवधी, भोजपुरी, ब्रज जैसी संस्कृतियों ने सम्मिलित रूप से व्यापक स्तर पर हिंदी संस्कृति के निर्माण में कहीं न कहीं योगदान दिया है।कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी अगर अपनी पृथक संस्कृति के निर्माण के प्रति सचेत होती तो संभवत: भारत में इतनी विविधता भी नहीं होती और वह भी एकरसता वाला देश बन कर रह जाता। भारत के पूरे व्यापार का माध्यम होने के बावजूद एकाधिकारी प्रवृत्ति से बचे रहने से बढ़ा कार्य कोई समाज नहीं कर सकता था। हिंदी समाज ने इस असंभव को संभव कर दिखाया है।आज जब हिंदी पुन: बाजार की भाषा बन गई है तब विदेशी व्यापारिक हथकंडों से लैस एक वर्ग इसमें अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप कर इसकी सहजता को नष्ट कर देना चाहता है। दु:ख इस बात का है कि हिंदी को समझने व व्यवहार में लाने वाला प्रबुद्धतम वर्ग भी इसमें षड़यंत्रपूर्वक सम्मिलित हो गया है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि इसके लोकव्यापी स्वरूप को बचाए रखा जाए। पिछले एक हजार साल हिंदी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद स्वयं को भारतीय संस्कृति का पर्याय बनाए हुए है और यहां पर निवास करने वाला समाज इसका यह स्वरूप हमेशा बनाए भी रखेगा।इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

16.3.09

सीनियर रिपोटर्र की सोच

लालटेन जलाई तेरी, लालटेन बुझाऊँ तेरी
एकई खबर में मिट्टी में मिलाय दऊँ
बात न जो मानै मेरी, कर दऊँ में ख्वारी तेरी
सारे सहर में रायतौ सौ फैलाय दऊँ।
आवन दै अपने तू अध्यक्ष महोदय कूँ।
बाके आगे तेरी सारी बत्ती मैं बुझाय दऊँ।
डॉ. भानु प्रताप सिंह
डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट भानुहिन्दुस्तान डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम

15.3.09

भारत के कर्णधारों से करबद्ध प्रार्थना

हमारे देश की लगभग २० प्रतिशत जनसंख्या ही अंग्रेजी समझ सकती है। शेष जनसंख्या हिन्दी ही जानने वाली है। आप सभी से प्रार्थना है कि देश की बहुसंख्यक जनता के लिए तथा राष्ट्रभाषा के सम्मान के लिए हिन्दी भाषा एवं देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करें। हमारे देश की प्रान्तीय भाषाएं भी अत्यन्त प्रिय, मधुर व संस्कृत मिश्रित हैं। देश के सभी लोगों को प्रान्तीय भाषाओं का भी आदर करना चाहिए तथा कुछ वाक्य प्रत्येक प्रन्तीय भाषा के अवश्य सीख लेना चाहिए जिससे उस प्रान्त में जाने के बाद या उस प्रान्त के किसी व्यक्ति से मिलने पर दो-चार वाक्य बोल सकें।

आज विश्व भाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रचलन बढ़ रहा है। अंग्रेजी पढ़ना, उसका ग्याता होना बुरी बात नहीं है। किन्तु राष्ट्रभाषा हिन्दी बोलने एवं लिखने में हमें गर्व का अनुभव करना चाहिए। बहुत से ऐसे लोग हैं जो अंग्रेजी के विद्वान होते हुए भी घर अथवा बाहर हिन्दी का ही प्रयोग लिखने व बोलने में करते है। वर्तमान में, विदेशों में जाने के बाद या यहाँ भी जो विदेशी कम्पनियाँ हैं, वे सभी कार्य अंग्रेजी में ही करती हैं, सेवा में भी अंग्रेजी जानने वालों को ही रखा जाता है। अतः अंग्रेजी का सीखना व जानना बुरा नहीं हैं। किन्तु प्रत्येक नागिरक को बोलने एवं लिखने में अपनी राष्ट्रभाषा का ही प्रयोग करना चाहिए।

मेरी संसद सदस्यों से भी करबद्ध प्रार्थना है कि वे भी हिन्दी या प्रान्तीय भाषाओं में ही बोलें। इससे देशवासी भी दूरदर्शन के माध्यम से प्रान्तीय भाषाओं का आनन्द ले सकेंगे। दूरदर्शन व आकाशवाणी से यह प्रार्थना है कि वे भी अपने प्रासारणा में हिन्दी व प्रान्तीय भाषा का ध्यान अवश्य रखें।

विभिन्न वस्तुओं के निर्माताओं पर विवरणा ऊपर हिन्दी में, नीचे प्रान्तीय भाषा में तथा उसके नीचे अंग्रेजी भाषा में लिखना चाहिए ताकि बहुसंखयक लोग उसे पढ़कर उपयोग में ला सकें। विदेशी कम्पिनयों से भी प्रार्थना है कि वे भारत की राष्ट्रभाषा का सम्मान करते हुए हिन्दी भाषा का ही लिखने एवं बोलने में प्रयोग करें।

जो विद्यालय अंग्रेजी माध्यम हैं, वे भी राष्ट्रभाषा हिन्दी पर विशेष ध्यान दें तथा अंकों को भी देवनागरी लिपि के अनुसार पढ़ायें । उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों से भी प्रार्थना है कि वे हिन्दी भाषा में ही बोलें एवं इसी में गर्व का अनुभाव करें।

डॉ० कर्ण सिंह से प्रार्थना है कि विश्व हिन्दी सम्मेलन करना उत्तम है। किन्तु अपने देश में जहाँ की राष्ट्रभाषा हिन्दी है, वहाँ कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका का कार्य हिन्दी में हो सकें, ऐसा प्रयास करें।

आम जनता से भी प्रार्थना है कि अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी बोलने एवं लिखने में स्वाभिमान का अनुभव करें तथा हिन्दी को राष्ट्रभाषा होने का गौरव प्रदान करें।
मोहन राय
३४, गोविन्द नगर शाहगंज, आगरा

ये भी हिन्दी बोलते हैं



प्रत्येक राष्ट्र की एक राष्ट्र भाषा होती है। उस भाषा पर देश के प्रत्येक नागरिक को गर्व होता है। एक विश्व भाषा होती है। प्राचीन काल में संस्कृत विश्व की भाषा थी। अब वह स्थान अंग्रेजी लेती जा रही है। किन्तु विश्व का प्रत्येक नागरिक अपने राष्ट्र की भाषा का सम्मान व उसी का उपयोग बोलने एवं लिखने में करता है। विदेशों से आए राष्ट्राध्यक्ष, चाहे वे ब्रिटेन, अमेरिका, जापान, रूस या खाड़ी देश कहीं के भी हों, अपनी राष्ट्र भाषा के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए उसी में बोलते हैं।
भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी है। अतः हम संकल्प करें कि हिन्दी में ही बातचीत करेंगें। १८५७ के बाद देश की आजादी के मार्गदर्शक लाल, बाल, पाल हिन्दी में ही बोलते थे। महात्मा गांधी, पं० जवाहर लाल नेहरू, पं० मदन मोहन मालवीय, मौलाना आजाद, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, सरदार बल्लभ भाई पटेल, श्री लाल बहादुर शास्त्री, डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णनन, डॉ० हेडगेवार, डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी, श्री माधव सदाशिव गोलवलकर, श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री चंद्रशेखर सिंह आदि सभी भारत के मान्य जन हिन्दी में ही प्रवचन करते थे। सम्पूर्ण देश सहर्ष स्वीकार करता था।
नवनिर्वाचित महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल अच्छी अंग्रेजी जानने के उपरान्त भी अपने भाषण हिन्दी में ही करतीं हैं। निवर्तमान उपराष्ट्रपति श्री भैंरों सिंह शेखावत जी हिन्दी का ही प्रयोग करते हैं। यह ही नहीं, उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार श्रीमती नजमा हेपतुल्ला व श्री अंसारी भी सामान्य रूप से हिन्दी का ही प्रयोग करते हैं। कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने भारत में आकर हिन्दी सीखी और अब हिन्दी में ही भाषण करतीं हैं। श्री राहुल गांधी भी अच्छी हिन्दी बोलते हैं। संघ के सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी कई भाषाओं के ग्याता होते हुए भी हिन्दी में ही भाषण करते हैं। भाजपा अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह, राजद अध्यक्ष श्री लालू प्रसाद यादव, सपा अध्यक्ष श्री मुलायम सिंह यादव, बसपा अध्यक्ष सुश्री मायावती एवं श्रीमती सुषमा स्वराज भी अंग्रेजी जानते हुए भी राष्ट्रभाषा हिन्दी में ही बोलते हैं। यहाँ तक कि रसायन मन्त्री श्री रामविलास पासवान ने औषधियों के डिब्बों पर हिन्दी भाषा में लिखने का आदेश कर दिया है तथा स्वयं भी हिन्दी ही बोलते हैं।


मोहन राय
३४, गोविन्द नगर शाहगंज, आगरा

10.9.08

हिन्दी के देश में हिन्दी की लड़ाई

क्या यह देश मुकेश जैन, श्यामरूद्र पाठक, डॉ० मुनीश्वर गुप्त, चन्द्र शेखर उपाध्याय और भानु प्रताप सिंह को जानता है ये वे लोग है जिनके लम्बे संघर्ष के चलते इंजीनियरिंग, चिकित्सा-विग्यान, विधि और अब प्रबन्धन के उच्च-पाठ्यक्रमों में हिन्दी भाषा पहली बार वैकल्पिक माध्यम बनी। लेकिन गुपचुप गणतंत्र रचते ये हिन्दीवीर गुमनामी के अंधेरे में है। राजनीति के कुचक्र में फंसे तमाम हिन्दी संस्थानों, हिन्दी के नाम पर सरकारी इमदाद वसूलती लब्ध-प्रतिष्ठित संस्थाओं व पुरस्कारों पर नजरें गढ़ाए कथित हिन्दीसेवियों को फुर्सत नहीं कि वे उन्हें खोजें और उनके अनुभवों का उपयोग कर हिन्दी को अंग्रेजी की वैशाखियों से त्राण दिलायें। यह दिलचस्प तथ्य है कि तकनीकि, चिकित्सा-विग्यान, विधि और प्रबन्धन के क्षेत्र में राष्ट्रभाषा की प्रतिष्ठा का यह नवअभियान अविभाजित उत्तर-प्रदेश (अब उत्तराखण्ड) से शुरू होकर दिल्ली होता हुआ आगरा तक पहुंच गया लेकिन पूरे रास्ते में हिन्दी की दुर्दशा पर आंसू बहाने वाले कथित हिन्दी सेवियों को इसकी गूंज तक सुनायी नहीं दी। हिन्दी के देश में हिन्दी की लड़ाई, सुनने में अजीब सा लगता है लेकिन बकायदा जंग हुई थी, दिल्ली के वोट-क्लब पर धरना, संसद के अन्दर पर्चे फेंकने व बाहर प्रदर्शन, भूख-हड़ताल, जनसम्पर्क, हस्ताक्षर-अभियान, पोल खोलो-जोर से बोलो, रैली और लाठीचार्ज सब हुआ। इतना ही नहीं जब इन हिन्दीवीरों को विविध परीक्षाओं में हिन्दी में लिखने नहीं दिया गया तो विरोधस्वरूप वहां उत्तरपुस्तिकाएं भी उन्होंने जलायी, ऐसा देश की राजधानी में हुआ। हिन्दीवीर विरोध स्वरूप पर्चे लेकर संसद की गैलरी तक में कूदे, घायल हुए, पर कथित हिन्दी सेवियों को इसमें दिलचस्पी नहीं। शुरूआत शामली के एक नौजवान मुकेश जैन ने की और केन्द्र बना रूड़की विश्वविद्यालय। १९८० में तब वहां आई०आई०टी० संस्थान नहीं था। रूड़की विश्वविद्यालय ही इंजीनियरिंग की परीक्षा आयोजित कराता था। धातुकर्म शाखा से बी०टेक० कर रहे मुकेश जैन ने रुडकी आने से पहले एक अंग्रेजी विरोधी संस्था बनाई थी। बी०टेक० करते हुए छात्रों के बीच इस बाबत उन्होंने हस्ताक्षर अभियान चलाया कि न सिर्फ उत्तरपुस्तिकाएं हिन्दी में लिखी जाएं बल्कि प्रश्नपत्र भी हिन्दी में हों। तमाम बाधा-अवरोधों के पश्चात उन्हें सफलता मिली। १९८४ में चतुर्थ वर्षीय बी०टेक० पाठ्यक्रम हिन्दी भाषा में पूर्ण करने के पश्चात मुकेश जैन ने अंग्रेजी अनिवार्यता विरोधी मंच का गठन किया और मांग की कि देश में अन्य आई०आई०टी० संस्थानों में इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा हिन्दी में भी हो। वर्ष १९८४ में रूड़की में आयोजित इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में मुकेश जैन की अपील पर कई विद्यार्थियों ने अपनी उत्तरपुस्तिकाएं हिन्दी में लिखी। कक्ष निरीक्षकों द्वारा रोके-जाने पर अनेक विद्यार्थियों ने अपनी उत्तरपुस्तिकाएं जला दी इस घटना को संवाद एजेन्सी पी०टी०आई० ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। अब मसला रूड़की तक का नहीं रहा, देश की राजधानी दिल्ली तक अंग्रेजी विरोधी बयार पहुंच गयी थी। बिहार के एक संस्कृत अध्यापक के पुत्र श्री श्यामरूद्र पाठक ने दिल्ली के आई०आई०टी० संस्थान में हिन्दी के समर्थन में मुहिम छेड़ दी। गांव की अतिसाधारणा पृष्ठभूमि से आये विलक्षण छात्र श्यामरूद्र पाठक ने वहां १९८५ में बी०टेक० (अंतिम वर्ष) की पढाई करते हुए जब अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट हिन्दी भाषा में दाखिल करने की अनुमति मांगी तो आई०आई०टी० दिल्ली के निदेशकों ने इसे एक बेतुकी कोशिश बताया। इस पर श्यामरूद्र पाठक आन्दोलित हो गए। कठिन परिस्थितियों में बी०टेक० की परीक्षा में असाधारण अंक प्राप्त करने वाले श्यामरूद्र पाठक ने जब इंजीनियरिंग के परास्नातक (एम०टेक०) से पूर्व जीएआईईटी ग्रेजुएट एटीट्यूड इन इंजीनियरिंग टेस्ट की परीक्षा में देश भर में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया तब उस समय देश के पाँचों आई०आई०टी० संस्थान चौकन्ना हुए। एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार-पत्र की संवाददाता पत्रलेखा चटर्जी ने श्यामरूद्र पाठक के संघर्ष का पूरा वृतान्त अपने समाचार पत्र में प्रमुखता से लिखा। अखिल भारतीय स्तर की इस कठिन परीक्षा में हिन्दी पृष्ठभूमि के श्यामरूद्र पाठक ने ९९-८९ प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। इसके पश्चात देश के कई प्रमुख हिन्दी दैनिक समाचार-पत्रों के वरिष्ठ पत्रकारों के लेखों ने श्यामरूद्र पाठक के अभियान को देशव्यापी बना दिया। अगस्त १९८५ में सांसद (अब स्वर्गीय) भगवत झा आजाद ने मामला संसद में उठाया। तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष श्री बलराम जाखड़ ने संग्यान लेते हुए मामला शिक्षा मंत्री के०सी० पन्त को प्रेषित किया और तत्काल प्रभावी कदम उठाने को कहा। भगवत झा आजाद द्वारा संसद को प्रेषित ग्यापन में ८५ सांसदों के हस्ताक्षर थे। राज्य सभा के तत्कालीन सदस्य कैलाशपति मिश्र ने ४५ सांसदों के हस्ताक्षर युक्त एक ग्यापन सभापति को सौंपा तथा हस्तक्षेप की मांग की। अपनी मांग पर निरन्तर पदयात्रा कर रहे श्यामरूद्र पाठक अब दिल्ली के शास्त्री भवन के बाहर धरने पर बैठ गए श्यामरूद्र पाठक से तब के प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हाराव समेत अनेक बड़े नेता मिले। अन्त में केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय की पहल पर आई०आई०टी० संस्थानों की एक उच्चस्तरीय समिति ने श्यामरूद्र पाठक की हिन्दी भाषा में लिखी प्रोजेक्ट रिपोर्ट को स्वीकार करने की अनुशंसा की। हिन्दी की प्रतिष्ठा के इस अभियान की लपट अब दिल्ली से होती हुई आगरा तक पहुंच गयी थी। फिरोजाबाद के व्यवसायी परिवार के डॉक्टर पुत्र मुनीश्वर गुप्त ने सारे सुख-ऐश्वर्य ठुकराते हुए हिन्दी माध्यम से एम०डी० करने की घोषणा की। मुश्किलों का सामना करते हुए १९८७ में डॉक्टर मुनीश्वर गुप्त को हिन्दी भाषा में एम०डी० की उपाधि मिली। यह हिन्दी में दुनिया का पहला चिकित्सा शोध पत्र था। आगरा विश्वविद्यालय व सरोजनी नायडू मेडिकल कालेज को इसे स्वीकार करना पड़ा। १९९० में एल-एल०एम० की परीक्षा हिन्दी-माध्यम से कराने की मांग पर आगरा के ही चन्द्रशेखर उपाध्याय ने संघर्ष छेड़ दिया, तब तक एल-एल०एम० की परीक्षा सिर्फ अंग्रेजी माध्यम से ही होती थी। बताते चलें कि शहीदे आजम भगत सिंह आगरा के नूरी दरवाजा में रहे और बम बनाया, वही बम उन्होंने असेम्बली में फेंका। २३ मार्च १९३१ को भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव देश के लिए बलिदान हुए। उनकी शहादत के ठीक ५९ साल बाद २३ मार्च १९९० को चन्द्रशेखर आगरा विश्वविद्यालय के प्रांगण में भूख हड़ताल पर बैठ गए। तीन दिन तक विश्वविद्यालय प्रशासन न सिर्फ मूकदर्शक बना रहा बल्कि हठधर्मी रवैया अपनाते हुए तीसरे दिन मध्य रात्रि को सोते हुए चन्द्रशेखर उपाध्याय को उठा लिया गया और तम्बू उखाड़ दिए गए। इससे छात्रों में रोष फैल गया। चन्द्रशेखर उपाध्याय ने विद्यार्थियों से शिक्षण-संस्थाओं के बायकाट का आह्वान किया। विश्वविद्यालय प्रशासन के इस आतंक के खिलाफ २७ मार्च को आगरा में अपूर्व बन्द रहा। नाराज छात्रों ने शैक्षणिक-संस्थाएं बन्द करा दीं। चन्द्रशेखर का हौंसला बढ़ गया। चन्द्रशेखर फिर भूख-हड़ताल पर बैठ गए। विश्वविद्यालय प्रशासन को झुकना पड़ा, कुलपति मौके पर पहुंचे और कार्यालय में बात करने की बात कही, चन्द्रशेखर ने अस्वीकार कर दिया। छात्रों के बीच उन्होंने कुलपति से दो मांगे की। पहली एल-एल०एम० की परीक्षा में हिन्दी भाषा वैकल्पिक माध्यम हो, दूसरी आगरा विश्वविद्यालय के किसी भी विधि प्राध्यापक को एल-एल०एम० परीक्षा का दायित्व न दिया जाए। परीक्षा तिथि घोषित हो चुकी थी। कुलपति ने कहा कि प्रश्नपत्र अंग्रेजी में ही होंगे, परन्तु विद्यार्थी उसका उत्तर हिन्दी में भी लिख सकते है। चन्द्रशेखर ने अस्वीकार कर दिया। उनकी मांग थी कि प्रश्नपत्र में अंग्रेजी के साथ हिन्दी में भी प्रश्न पूछे जाएं। परीक्षाएं टल गयीं, लम्बी जद्दोजेहद के बाद कुलपति ने बार कौंसिल आफ इण्डिया और बार कौंसिल आफ उत्तर प्रदेश से इस बाबत अनुमति ली। यह पहला मौका था जब देश में एल-एल०एम० की परीक्षा हिन्दी में हो रही थी। चन्द्रशेखर ५४ प्रतिशत अंकों के साथा उत्तीर्ण हुए। १९९३ में दूसरे वर्ष की परीक्षा में हिन्दी में उत्तर लिखने पर चन्द्रशेखर को अनुत्तीर्ण कर दिया गया। फिर छात्र-संघर्ष समिति बनी। जोरदार आन्दोलनों, धरनों का लम्बा दौर चला। भरतपुर की तत्कालीन भाजपा सांसद राजकुमारी दीपा कौर ने संसद में हिन्दी के अपमान का प्रश्न उठाया। पूरे देश में इसकी गूंज हुई, हस्ताक्षर अभियान चला, छात्र संघर्ष समिति ने न्यायालय में जाने का ऐलान किया। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भण्डारी के हस्तक्षेप पर कुलपति मंजूर अहमद के नेतृत्व में पांच सदस्यीय परीक्षा पुर्नमूल्यांकन समिति बनी, चन्द्रशेखर की उत्तर पुस्तिकाओं का पुर्नमूल्यांकन हुआ। जिन विषयों में चन्द्रशेखर को शून्य व तीन अंक दिए थे। उनमें उन्हें क्रमशः ७३ व ६९ अंक मिले, जो आपराधिक विधि के अब तक के सर्वोच्च अंक थे। हिन्दी भाषा में लिखी चन्द्रशेखर की उत्तर-पुस्तिकाओं को परीक्षक ने मानद पुस्तिकाओं के रूप में रखने की अनुशंसा की। इसके बाद तो हिन्दी माधयम के छात्रों के लिए विधि की सर्वोच्च उपाधि उत्तीर्ण करने का रास्ता खुल गया। आज भी अनेक विश्वविद्यालयों में छात्र हिन्दी माध्यम से एल-एल०एम० कर रहे हैं। एक लम्बा संघर्ष। कैरियर के बहुमूल्य सात वर्ष भेंट चढ़ गए। दो वर्ष की जगह सात वर्ष में एल-एल०एम० की डिग्री मिली। चन्द्रशेखर को हिन्दी भाषा के प्रति प्रेम के संस्कार मानो जन्म से घुट्टी में मिले थे जिसे वर्ष वे जन्मे, उसी वर्ष उनके पिता को हिन्दी आन्दोलन में जेल जाना पड़ा। माँ की गोद में यह सब उन्होंने निश्चित ही देखा-सुना होगा। माँ के अनवरत त्याग और संघर्ष से बचपन में ही हिन्दी के लिए कुछ करो का अंकुर पड़ गया था। आपातकाल में उनके पिता के स्वास्थ्य को गम्भीर आघात लगा जो अल्पायु में उनकी मृत्यु का कारण बना। जब चन्द्रशेखर एल-एल०एम० में हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष कर रहे थे तब उनके पिता दिवंगत हो चुके थे। उन्हीं के साथी प्राध्यापकों ने उनके पुत्र के हिन्दी भाषा में एल-एल०एम० करने के संकल्प को पूरा न होने देने की गरज से सभी वैध-अवैध हथकण्डे अपनाए थे लेकिन बाद में सभी को उस पवित्र संकल्प के आगे नतमस्तक होना पड़ा था। नब्बे का दशक लगभग हिन्दीवासियों के ही नाम रहा। नब्बे के दशक तक हिन्दी माध्यम से एल-एल०बी० करने वाले विद्यार्थियों को दिल्ली उच्च न्यायालय में वकालत करने की अनुमति नहीं थी वहां की बार कौंसिल का यह प्रतिबन्ध था। इस भाषाई अवरोध के खिलाफ पुष्पेन्द्र चौहान खडे़ हो गए थे। दस जनवरी १९९१ को पुष्पेन्द्र चौहान लोकसभा के अन्दर दर्शकदीर्घा से नारे लगाते हुए वहां कूद पड़े जहां प्रधानमंत्री समेत देश के शीर्षस्थ नेता थे। उनकी पसलियां टूट गयीं। ११ जनवरी को लोकसभा में उस प्रस्ताव को पुनः दोहराया गया, जो २६ मई १९८९ को उसने पारित किया था, जिसमें अंग्रेजी कैसे हटे? इसके लिए एक समिति बनाने का प्राविधान था। पुष्पेन्द्र चौहान इसके बाद भी अपनी मांग को लेकर जूझते रहे। अन्त में बार-कौंसिल से अथक प्रयत्नों के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय में हिन्दी माध्यम से एल-एल०बी० करने वाले छात्रों को भी वकालत करने की अनुमति मिल पायी। हिन्दी के सम्मान के लिए चौदह साल तक शास्त्री भवन के बाहर धरना देने वाले पुष्पेन्द्र चौहान को आज हिन्दी के माध्यम से एल-एल०बी० करने वाले वो वकील भी नहीं जानते जो पुष्पेन्द्र की बदौलत आज दिल्ली उच्च न्यायालय में वकालत कर रहे हैं। इसी तपिश में एक नाम विनोद गौतम का भी है, विनोद गौतम ने कठिन परिस्थितियों में न सिर्फ ए०एम०आई० की प्रारम्भिक परीक्षा व पाठ्यक्रम में हिन्दी भाषा को वैकल्पिक माध्यम कराने की लड़ाई में सफलता प्राप्त की, बल्कि आने वाले विद्यार्थियों की सुविधा के लिए अपनी जेब से पैसा खर्च कर छह पुस्तकें भी लिखीं। तब तक अंग्रेजी माध्यम में ही उपलब्ध ए०एम०आई० व पॉलिटेक्निक की इन पुस्तकों का हिन्दी अनुवाद करने व उन्हें प्रकाशित करानें में विनोद गौतम को फांके तक करने पडे़ थे। १९८६-८७ में अजय मलिक ने जामिया-मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में हिन्दी का ध्वज उठा लिया। तब वहां एम०एड० अंग्रेजी व उर्दू में ही होता था। अजय मलिक ने कहा कि एम०एड० हिन्दी में भी हो। कड़ी मशक्कत के बाद यूनिवर्सिटी ने उनकी मांग को माना। वहां इस बाबत आन्दोलन भी चला। १९८६-८७ में एम०डी० की थीसिस हिन्दी में लिखने वाले डॉ० मुनीश्वर को तब एक लड़ाई और लड़नी पड़ी थी। सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा गया कि देश भर के सभी मेडिकल कालेजों में एम०बी०बी०एस० और बी०डी०एस० की पन्द्रह-पन्द्रह प्रतिशत सीटों की परीक्षाएं सिर्फ अंग्रेजी भाषा में ही होगी, ये सीटे कुल १६०० थी। हिन्दी हित रक्षक समिति इस पर आन्दोलित हो गयी। सर्वोच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने लम्बी सुनवाई के बाद मामला केन्द्र सरकार को भेज दिया, प्रसिद्ध वकील श्री लक्ष्मीमल सिंघवी ने अदालत में तर्कपूर्ण जिरह की। लम्बी जद्दोजहद के बाद केन्द्र सरकार को स्वीकार करना पड़ा कि उपरोक्त सीटों की परीक्षाओं में विद्यार्थी अंग्रेजी के अलावा हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी परीक्षा दे सकते है। अस्सी की शुरूआत में शुरू हुआ हिन्दी के मान सम्मान का चुनौती भरा सफर २१वीं सदी तक जारी है। अबकी फिर आगरा इसका पड़ाव बना। खांटी पत्रकार भानु प्रताप सिंह इस बार झण्डालम्बरदार बने। प्रबन्धन में हिन्दी भाषा में अपना शोध-पत्र स्वीकार कराने की मांग पर वो छह साल तक डटे रहे। उनके इस अभियान पर अंग्रेजीदां जमात का तर्क था कि अंग्रेजी न जानने वाले अच्छे प्रबंधक नहीं बन सकते। शुरू में बात ठीक ही लगती थी क्योंकि अंग्रेजी जानने वाले लोग ही प्रबन्धन के क्षेत्रों में शिखर पर आज दिखाई देते है। साधारण पृष्ठभूमि के भानु प्रताप सिंह को पत्रकारिता की सीढ़ी तक पहुंचने में ही नाको-चने चबाने पड़े थे, अपने अभियान पर आगा-पीछे सोचे बिना वो चल पड़े, अखबार की मामूली तनख्वाह में वो लड़ते रहे, जूझते रहे इसलिए कि गरीब का बेटा भी प्रबन्धन की बुलन्दियों पर आरूढ़ हो सकता है। केवल भाषाई अवरोध के कारण वो पायदान पर क्यों खड़ा रहे? उन्हें कामयाबी मिली। अपने शोध-पत्र में भानु ने न सिर्फ अपनी अट्ठारह साला पत्रकारिता के अनुभव लिखे बल्कि उस दौरान प्रशासन व प्रशासनिक अधिकारियों के मेलजोल की अपनी यादों को भी उड़ेल दिया। प्रबंधन के क्षेत्र में हिन्दी भाषा में लिखा यह दुनिया का पहला शोध पत्र है। इतनी कामयाबियों के बाद आज यक्ष प्रश्न यह है कि क्या अट्ठाईस वर्ष बाद भी हिन्दी, अंग्रेजी के मकड़जाल से मुक्त हो गई? क्या हिन्दी को उसका यथोचित सम्मान मिल गया? क्या हिन्दी रोजी-रोटी से जुड़ गयी? क्या अंग्रेजी के हैंगओवर से देश का प्रभुवादी, सुविधासम्पन्न, साधन भोगी समाज छिटक गया? उत्तर मिलता है, जी नहीं। किसी भी यात्रा का सबसे दुःखद परिणाम यह होता है कि लम्बी दूरी तय करने के बाद भी पथिक अपने को उसी बिन्दु पर खड़ा पाता है जहां से उसने यात्रा प्राम्भ की थी। देश की स्वतंत्रता के छह दशक से भी अधिक और हिन्दी के इस नवअभियान के अट्ठाईस वर्ष बीत जाने पर भी हिन्दी आज अघोषित आपातकाल की जद में है। अभी देश में नौ परीक्षाएं बड़े स्तर की ऐसी हैं जहां हिन्दी गायब है। इनमें एस०सी०आर०ए० और संघ लोक सेवा आयोग की कई परीक्षाएं शामिल हैं। २००३ में उत्तर प्रदेश में न्यायपालिका के हितों पर ऐसा भीषण कुठाराघात किया गया जो संभवतः अंग्रेजी के दुस्साहस से भी परे था, ऐसा करना अंग्रेजो के लिए भी नामुमकिन होता। उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा परीक्षा में २००३ से पहले १०० अंक का एक प्रश्नपत्र भाषा का होता था, जिसमें उर्दू (फारसी लिपि) में लिखे एक पैराग्राफ का हिन्दी में अनुवाद करना होता था या हिन्दी में एक पैराग्राफ को उर्दू में लिखना होता था तथा अंग्रेजी के एक पैरा को न्यायालय की सामान्य भाषा में अनुवाद करना होता था। २००३ के संशोधन के बाद भाषा के इस प्रश्न-पत्र में पूर्णांक १०० के स्थान पर २०० अंक कर दिये गए है। जिसमें ३० अंक अंग्रेजी निबंध, ६० अंक अंग्रेजी में सार लेखन, ४० अंक हिन्दी से अंग्रेजी में एक परिच्छेद का अनुवाद तथा ४० अंक अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद के लिए सुरक्षित कर दिए गए हैं। कितनी बिडम्बना की बात है कि वर्तमान उत्तराखण्ड और तब का अविभाजित उत्तर-प्रदेश जहां से अंग्रेजी के वर्चस्व को समाप्त करने का अभियान शुरू हुआ। उस उत्तराखण्ड के अधिवक्ता हिन्दी भाषा के माध्यम से उच्च न्यायिक सेवा (एच०जे०एस०) की परीक्षा में सम्मिलित नहीं हो सकते। इस अपमान के बाद टिप्पणी यह भी आती है कि अंग्रेजी न जानने वाला जिला-जज बनने के योग्य नहीं है। आज २००८ में भी उत्तराखण्ड में यह दृश्य है कि हिन्दी भाषा को माध्यम बनाने वाले अधिवक्ता उच्च न्यायिक सेवा (एच०जे०एस) की परीक्षा में सम्मिलित नहीं हो सकते। जिस उत्तराखण्ड में वर्ष २००४ में ही उच्च-न्यायालय में हिन्दी भाषा में प्रतिशपथपत्र दाखिल हो गया हो। आज वहां मुकदमों की सुनवाई, बहस और प्रक्रिया सभी अंग्रेजी में ही है जबकि केशवानन्द भारती बनाम् राज्य १९७३ सुप्रीम कोर्ट में उच्च न्यायालय में हिन्दी भाषा में भी समस्त कामकाज निपटान की व्यवस्था दी गयी है।

8.9.08

चन्द्रशेखर उपाध्याय ने ऐसे फहराई हिन्दी की पताका


कैरियर की जद्दोजेहद, अखबार की कमजोर नौकरी, पहाड़ सी सामाजिक जिम्मेदारियां, कुछ इस वातावरण में शुरू हुआ था न्याय और विधि के क्षेत्र में हिन्दी की पूर्णप्रतिष्ठा का अभियान। अखबार के दफ्तर में रात की पाली में काम करते हुए यह संकल्प लिया था। चला, तब जेब में आठ सौ रुपए थे, बैंक में खाता ही नहीं था तो भरा और खाली होने का सवाल बेमानी था।
१२वीं कक्षा में पढ़ते हुए जब 'आज' अखबार में अपने पोथी-पत्रा लेकर पहुंचा तो पत्रकार और विधि प्राध्यापक बनने का सपना भी मेरे साथ था। थोड़ी देर में सम्पादक और मेरे सबसे आदरणीय और प्रिय भ्रातातुल्य श्री शशि शेखर जी (वर्तमान में समूह-सम्पादक दैनिक अमर उजाला) का कक्ष में आने के लिए बुलावा आया, मुझे देखकर चौंके, बेटा क्या छपवाना है? उनका पहला प्रश्न था। मैंने धीरे से लगभग हकलाते हुए कहा, छपवाना नहीं, छापना है। फिर डपटने वाले अंदाज में पूछा, क्या चाहते हो? पत्रकार बनना चाहता हूं, मैंने कहा था। फिर सहज होकर जोर से हंसे और बोले, अभी पत्रकार बनने के लिए तुम बहुत छोटे हो, पहले पढ़ो, फिर पत्रकार बनना। मैंने कहा कि मैं पढ़ने के और लड़ने के लिए पत्रकार बनना चाहता हूं। वो गंभीर हो गए। फिर पूछा, समाचार क्या होता है? मैंने कहा, जो कुछ नया घटता है उसे समाचार कहते है। एक क्षण उनकी आंखों में अपनत्व का ऐसा भाव उभरा, मुझे लगा कि मैं छायादार और फलदार विशालकाय वृक्ष के नीचे खड़ा हूं। पिता का साया बचपन में ही मेरे सिर से उठ गया था। मां पर हिमालय सी जिम्मेदारियां थी, मकान के आधे हिस्से का मामूली सा किराया, बाकी पिता की थोड़ी-बहुत संचित पूंजी, मैं मां पर बोझ नहीं बनना चाहता था। जब यह सब मैंने उन्हें बताया तो फिर उन्होंने कुर्सी पर बैठने को मुझे कहा। उनकी आंखों में स्नेह था और फिर उन्होंने मुझे खेल डेस्क पर भेज दिया।
स्नातक का परीक्षा परिणाम आने से पहले भारतीय जीवन बीमा निगम में विकास अधिकारी के पद पर मेरा चयन हो गया। मन नहीं लगा, छह महीने बाद त्यागपत्र देकर फिर आज अखबार ज्वाइन कर लिया। १९९० में छात्रसंघ का चुनाव लड़ा तो अखबार की नौकरी छूट गयी। उसी वर्ष २३ मार्च १९९० को हिन्दी का संघर्ष शुरू हो गया। २० जुलाई १९९० को अमर उजाला की नौकरी मिल गई और फिर पढ़ाई, अखबार की नौकरी व हिन्दी के लिए संघर्ष, तीनों एक साथ चले। अगला पड़ाव दैनिक जागरण और यूनीवार्ता । १९९० में एल-एल०एम० का विद्यार्थी बना था, अब १९९७ आ गया। मेरा वनवास सात वर्ष होम होने पर ही समाप्त हुआ।
सात वर्ष तक हिन्दी माध्यम की मेरी उत्तर-पुस्तिकाऒं को जांचा नहीं गया था। संसद व उत्तर-प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भण्डारी के हस्तक्षेप के बाद ही मेरी उत्तरपुस्तिकाएं जंची थी तब जाकर मैं हिन्दी माध्यम से एल-एल०एम० उत्तीर्ण करने वाला देश का प्रथम विद्यार्थी बना। हिन्दी माध्यम की उत्तर-पुस्तिकाओं में मैंने आपराधिक विधि में देश के अब तक के सर्वोच्च अंक प्राप्त किए। आपराधिक विधि में २०० पूर्णांक में अब तक १२२ अधिकतम अंक थे, मुझे ७३ व ६९ कुल १४२ अधिकतम अंक मिले और परीक्षक ने मेरी उत्तर-पुस्तिकाओं को मानद उत्तर-पुस्तिकाओं के रूप में रखने की अनुशंसा की।
उसी वर्ष १९९७ में अनुबन्धित विधि प्रवक्ता के रूप में राजस्थान चला गया। फिर सन् २००० में द्वितीय विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट(प्रथम श्रेणी) के रूप में लखनऊ में तैनात हुआ। विधि प्रवक्ता और जज भी हिन्दी में ही कार्य दायित्व निभाने का उत्कृष्ट उदाहरण रखने का प्रयत्न मैंने किया। २३ जुलाई २००० को लखनऊ में बतौर द्वितीय विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) मात्र एक दिन में २५० वाद निपटाने और १९ महीने में पौने चार हजार वाद निपटाने वाले एकमात्र न्यायाधीश बनने का सौभाग्य मुझे मिला। इन्हीं उपलब्धियों के चलते १९ फरवरी २००५ को न्यायिक क्षेत्र का प्रतिष्ठित 'न्याय-मित्र' पुरस्कार मुझे मिला। किसी जज को १३ साल बाद मिला यह पुरस्कार वाद-निर्णयों में विशेष गुणवत्ता, वादों के शीघ्र निस्तारण करने वाले ईमानदारतम् न्यायाधीश को ही मिलता है।
इस पुरस्कार को पाने से पहले २४ अगस्त २००४ को उत्तराखण्ड में देश के सबसे कम आयु के एडीशनल एडवोकेट जनरल की जिम्मेदारी मिली। मेरी उड़ान को मानो पंख मिल गए, मुझे अब न्याय व्यवस्था के सबसे ऊंचे पायदान पर बैठे लोगों को अपने अभियान से अवगत कराना था तो १२ अक्टूबर २००४ को महाधिवक्ता और सरकार के स्तर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में उत्तराखण्ड सरकार की ओर से हिन्दी भाषा में पहली बार प्रतिशपथपत्र प्रस्तुत किया। बाधा-अवरोध-प्रतिरोध आये, अपमान भी हुआ। सुविधाभोगी, साधनसंपन्न और प्रभुवादी अंग्रेजीदां जमात ने इसे एक निरर्थक कोशिश बताया और कहा कि इससे न्याय व्यवस्था का स्तर गिर जाएगा, क्वालिटी नहीं रहेंगी आदि-इत्यादि। तब और आज भी उत्तराखण्ड देश का पहला और एकमात्र राज्य बना जिसने महाधिवक्ता और सरकार के स्तर से देश के किसी हाईकोर्ट में हिन्दी भाषा में प्रतिशपथपत्र प्रस्तुत किया हो। तब देश के विधि क्षेत्र में इस घटना को हिन्दी के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण आंका गया था।
१५ मई २००५ को मेरे इस अभियान को तब बल मिला जब इस दिन पंजाब हिन्दी संस्थान की आधारशिला मुझसे रखवायी गई। महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने इससे पूर्व उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की आधारशिला रखी थी। मैं दूसरा हिन्दी सेवी था जिसे किसी हिन्दी संस्थान की आधारशिला रखने का सौभाग्य मिला। इसी पंजाब हिन्दी संस्थान में एक सहयोगी श्री निर्विकार सेठी और वहां सभी लोगों के सामूहिक प्रयत्न से एक वेबसाईट १५ मई २००६ को लांच की गई, इस दिन हम सभी ने एक सीडी भी लांच की जिसमें हिन्दी व कई अन्य भाषाऒं के सैकड़ों फान्ट फ्री कर दिए गए हैं। इस सीडी में कई कुंजी पटल है, फान्टों को परस्पर परिवर्तित करने का सॉफ्टवेयर भी उसमें है। सीडी में शब्दकोष है, वर्तनी जांचने का सॉफ्टवेयर है। कागज को स्कैन करके फॉन्ट में बदलने का टूल है। बोले हुए को लिपिबद्ध करने का टैक्सट-टू-स्पीच टूल है। पंजाब हिन्दी संस्थान की इस पहल का मकसद हिन्दी को पुराणपन्थियों और कट्टरपंथियों के पाले से निकालकर आम आदमी के घर तक ले जाना था। इस मकसद में हम कामयाब भी हुए।
अभी हाल ही में प्रबन्धन में पहली बार हिन्दी भाषा में स्वीकृत शोधपत्र में शोधार्थी श्री भानुप्रताप सिंह ने प्राक्कथन में अटल बिहारी वाजपेयी और मुलायम सिंह यादव के अलावा एमडी की थीसिस पहली बार हिन्दी में प्रस्तुत करने वाले डॉ० मुनीश्वर गुप्त के अलावा मुझे भी शामिल किया है।
मन खिन्न हो जाता है जब देखता हूं कि हिन्दी भाषा की प्रतिष्ठा का यह नव-अभियान अविभाजित उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखण्ड) में रुड़की से ही वर्ष १९८० में शुरू हु्आ। उसी उत्तराखण्ड के अधिवक्ता हिन्दी भाषा के माध्यम से उच्च न्यायिक सेवा(एच०जे०एस०) की परीक्षा में सम्मिलित नहीं हो सकते। इस अपमान के बाद टिप्पणी यह भी आती है कि अंग्रेजी न जानने वाला जिला जज बनने के योग्य नहीं है। आज २००८ में भी उत्तराखण्ड में यह दृश्य है कि हिन्दी भाषा को माध्यम बनाने वाले अधिवक्ता उच्च न्यायिक सेवा (एच०जे०एस) की परीक्षा में सम्मलित नहीं हो सकते। जिस उत्तराखण्ड में वर्ष २००४ में ही उच्च न्यायालय में हिन्दी भाषा में प्रतिशपथपत्र दाखिल हो गया हो। आज वहां मुकदमों की सुनवाई बहस और प्रक्रिया सभी अंग्रेजी में ही है जबकि केशवानन्द भारती बनाम् राज्य १९७३ सुप्रीम कोर्ट में उच्च न्यायालय में हिन्दी भाषा में भी समस्त कामकाज निपटाने की व्यवस्था दी गयी है। स्वयं इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रबन्धन समिति व अन्य बनाम् जिला विद्यालय निरीक्षक, इलाहाबाद (ए०आई०आर० १९७० इलाहबाद, १६४) में एक व्यवस्था प्रतिपादित की गयी जिसमें कहा गया कि माननीय उच्च न्यायालय में कोई भी आवेदन, हिन्दी भाषा में संलग्नकों सहित प्रतिपादित किया जा सकता है। हिन्दी में बहस हो सकती है और माननीय उच्च न्यायालय में हिन्दी भाषा में निर्णय, डिग्री या फिर आदेश प्रतिपादित किए जा सकते हैं, परन्तु माननीय उच्च न्यायालय के प्राधिकार से उन्हें अंग्रेजी में अनुवाद किया जाएगा। उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम २००० की धारा ८६ के अधीन माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद का उक्त आदेश उत्तराखण्ड राज्य में भी प्रभावी है।
इसके अतिरिक्त भारत के संविधान के अनुच्छेद ३४८ के खण्ड-दो व राजभाषा अधिनियम १९६३ की धारा-७ के उपबन्धों के अधीन महामहिम राष्ट्रपति से मांगी गई अनुज्ञा के विषय में माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा दिए जाने वाले किसी भी निर्णय, डिग्री या आदेश को हिन्दी में दिए जाने की महामहिम राष्ट्रपित की सशर्त स्वीकृति लागू है।
अभी २४ जुलाई २००८ मेरे हौसलों और हिम्मत की जीत का दिन बन गया जब यह सूचना सार्वजनिक हुई कि नैनीताल हाईकोर्ट में वादी अपना आवेदन हिन्दी भाषा में भी दाखिल कर सकता है और हिन्दी में बहस भी की जा सकती है, हिन्दी भाषा में निर्णय, डिग्री या फिर आदेश प्रतिपादित किए जा सकते है। यद्यपि हाईकोर्ट की सीढ़ियों पर अभी हिन्दी की पदचाप भी सुनाई नहीं देती है, हिन्दी वहां पूरी तरह गायब है लेकिन इस सूचना ने घटाटोप अंधेरे में उम्मीद की एक किरण जगाई है। मेरे हौसलों और हिम्मत का यकीनन यह सबसे अहम और मजबूत पड़ाव है। उत्तराखण्ड हिन्दी अभियान की आद्य-भूमि है। हिन्दी मां है, मां के सम्मान की तरह ही इसकी रक्षा करनी होगी। कालिन्दी के तट से शुरू हुआ यह अभियान गंगा के घाट तक आ पहुंचा। यह बड़े बदलाव का निशान है। गंगा के अविरल प्रवाह की तरह हिन्दी की धारा का सोपान भी कालिन्दी के तट(नई दिल्ली) पर ही हो ऐसी हिन्दीवीरों की इच्छा है।
मुकदमें में जकड़े इस देश के लाखों गरीबों की अपनी भाषा हिन्दी है। कटघरे में खड़ा मजबूर और गरीब वादकारी जानना चाहता है कि उसके विद्वान अधिवक्ता ने न्यायालय में क्या कहा और माननीय न्यायाधीश ने क्या सुना व समझा।
मंजिल से फकत कुछ कदम पहले जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो अपने लोग याद आते हैं। मेरे पहले संपादक श्री शशि शेखर जी, संरक्षक और भ्रातातुल्य अध्यापक प्रोफेसर (श्री) श्रीकृष्ण द्विवेदी (पूर्व डीन, विधि संकाय, आगरा विश्वविद्यालय), अरविन्द मिश्रा (विभागाध्यक्ष, विधि संकाय, आगरा कालेज), डॉ० एसके खण्डेलवाल (प्राचार्य बागला डिग्री कालेज, हाथरस), श्री राजेश अग्रवाल (पूर्व कैबिनेट मंत्री व वर्तमान विधायक बरेली नगर), मित्र दुर्गविजय सिंह एडवोकेट व राकेश अंशुमान पत्रकार आदि।
पापा-माँ, परिवार के सब लोग और सब बहनें। पत्नी कीर्ति ने हर परिस्थिति में मुझे लड़ने का हौसला दिया, अभावों में भी मैंने उसके चेहरे पर अपराजित होने का भाव देखा जिससे मुझे लड़ने की ताकत और चलने की शक्ति मिलती गई। अथर्वा, मेरी पुत्री जो अभी सातवीं कक्षा में है उसने कभी कोई ऐसी मांग नहीं रखीं जिसे मैं पूरा नहीं कर सकता था, जब मैं संघर्षों में घिर गया था और कई-कई सप्ताह बाद घर लौटता था तो मेरी पत्नी कीर्ति बताती थी कि छोटी सी अथर्वा पूजा के समय उनके साथ बैठ जाती थी और तुतलाते हुए हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करती थी, भद् वान मेरे पापा का ताम बना देना। अथर्वा इन संघर्षों के बीच कब सातवीं कक्षा में आ गई पता ही नहीं चला।
यजुर्वा, जिसे मैं प्यार से गुट्टू कहता हूं, अभी बहुत छोटा है लेकिन जब लड़ते-लड़ते मुझे थकान होने लगती है तो वो पता नहीं किन चक्षुओं से मेरी परेशानी को समझ लेता है और प्यार से हंसते हुए पूछता है - पापा का छोच रहे हो, सुस्त त्यों हो। तो फिर बाधा-अवरोध बौने हो जाते है। दोनों छोटे बच्चों की उन्मुक्त और निश्छल हंसी मुझे जहां फिर, लड़ने के लिए प्रेरित करती रहती हैं, वहीं समाज और राजसत्ता की उपेक्षा से मुझे लड़ाई की नई वजह मिलती रहती है।
न्याय व्यवस्था के शीर्ष पर मेरी हिन्दी प्रतिष्ठित हो, यह मेरा संकल्प है। अंतिम श्वांस तक हिन्दी के लिए मैं लडूंगा, मैं चलूंगा, यह मेरा स्वयं को, स्वयं ही दिया गया वचन है। हमारे आस-पास जो है या जिसे हम पाना चाहते है, वो शुरू में कल्पना भले हो लेकिन दृढ़ इच्छा शक्ति के सामने वो सच मिल ही जाता है। मैं सच को पाने के पथ पर हूं। हो सकता है अनेक लोग मुझसे असहमत हो क्योंकि सच जब अपना सफर शुरू करता है तो उससे सहमति रखने वालों की संख्या असहमति रखने वालों की अपेक्षा कई गुना कम होती है। लेकिन जो भी थोड़े-बहुत साथी है, मेरे लिए पर्याप्त है।




चन्द्र शेखर उपाध्याय