वेदमित्र
Ved Mohla <vedmohla@yahoo.com>
हिन्दी भाषा में अंगरेजी के शब्दों का समावेश करने के बारे में भाषाशास्त्रियों में चर्चाएं चलती रहती हैं। हिन्दी ही क्या, विभिन्न भाषाएं एक-दूसरी भाषा के शब्दों के आदान-प्रदान से मुख्यत: समृद्ध ही होती हैं। नए शब्द बहुधा एक नई ताजगी अपने साथ लाते हैं, जिससे भाषा का संदर्श व्यापक होता है। उदाहरण के लिए मानसून शब्द पूर्वी एशिया से भारत आया और ऐसा रम गया जैसे वह यहां का ही मूलवासी हो। दक्षिण भारत से ‘जिंजर’ सारी दुनिया में चला गया और विडम्बना यह है कि अनेक लोग उसे पश्चिम की देन मानते हैं। इसी प्रकार उत्तर भारत के योग शब्द से स्वास्थ्य लाभ करने वाले सारे संसार में फैले हुए हैं।
अभी पिछले कुछ वर्षों में इन्डोनेशिया आदि से ‘सुनामी’ की लहर ऐसी उठी जिसकी शक्ति सारे संसार ने अनुभव की। ‘रेडियो’ कहीं भी पैदा हुआ, वह सार्वभौमिक बन गया। अंगरेजी का ‘बिगुल’ पूरे दक्षिण एशिया में बजता है।
केवल शक्तिशाली शब्द ही दूसरी भाषाओं में नहीं जाते हैं। अनेक साधारण-से दीखने वाले शब्द भी महाद्वीपों को पार कर जाते हैं। जब लोग विदेश से लौटते हैं, तो वे अपने साथ वहां दैनिक व्यवहार में उपयोग होने वाले कुछ शब्दों को भी अपने सामान के साथ बांध लाते हैं। अंगरेज जब इंगलैण्ड वापस गए, तो भारत के ‘धोबी’ और ‘आया’ को भी साथ ले गए। इसी प्रकार पूर्वी और पश्चिमी अफ्रीका से लौटे भारतीयों का साथ ‘किस्सू’ (चाकू), ‘मचुंगा’ (संतरा) और ‘फगिया’ (झाड़ू) भी चली आई।
किसी अन्य भाषा के शब्दों या शब्द-समूहों का उपयोग हजारों वर्षों से होता आया है। यदि एक पंडितजी अपने हिन्दी प्रवचन में संस्कृत के किसी श्लोक आदि का उद्धरण दें या कोई मौलवी कुरान की अरबी भाषा की आयत के माध्यम से अपने विचार को सिद्ध करे, तो सुनने या पढ़ने वाले लोग उसका लोहा मानते हैं। लैटिन की कुछ पंक्तियां बीच में डाल देने से आलेख की गरिमा बढ़ जाती है। यदि कोई व्यक्ति शेक्सपियर, शैली या कीट्स आदि की कुछ पंक्तियां वक्तव्य में छिड़क दे, तो वह अपने अध्ययन की व्यापकता प्रदर्शित करता है। फ्रेंच मुहावरे ‘डे जावू’ आदि का प्रयोग मनुष्य के उच्च सामाजिक क्षेत्र की झलक दिखाता है।
दूसरी भाषा के शब्द देशी हों या विदेशी, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। हां, अन्तर पड़ता है उनकी मात्रा से। जहां एक ओर दाल में नमक की तरह दूसरी भाषा के शब्द उसे स्वादिष्ट बनाते हैं, वहां उनकी बहुतायत उसे गले से नीचे नहीं उतरने देती। एक बार एक संयासी भारत से इंगलैण्ड आए। अपने कुछ सलाहकारों के आग्रह पर उन्होंने अपना प्रवचन अंगरेजी में देना आरम्भ किया। श्रोताओं के हाव-भाव से शीघ्र ही उन्हें स्पष्ट हो गया कि सभी उनकी बात समझ रहे थे। तो फिर क्या कमी थी! उन्होंने प्रयोग के रूप में अपनी भाषा प्रवचन के बीच ही बदली ।हिन्दी में बोलने लगे। उसके साथ ही अंगरेजी के कुछ चुने हुए शब्द भी वे प्रयोग करते रहे। हृदय और मस्तिष्क के सम्मेलन ने उनके प्रवचन को सरस और प्रभावकारी बना दिया था।
जब हिन्दी के कुछ हितैषी अपनी भाषा में अंगरेजी की बढ़ती घिसपैठ का विरोध करते हैं, तो अंगरेजीवादी अल्पसंख्यक खीज उठते हैं। वे अपने विरोधियों पर आरोप लगाते हैं कि वे लोग हिन्दी को सभी अच्छी धाराओं से काटकर उसे तालाब या पोखर बनाना चाहते हैं। वह उनका दृष्टिकोण है, जो उनका मूलभूत अधिकार है। परन्तु यदि उपमा की बात हो, तो एक उपमा यह भी दी जा सकती है कि कोई भी स्वाभिमानी जलप्रबंधक एक स्वच्छ नदी में किसी भी छोटी-मोटी जलधारा को प्रवेश देने की अनुमति प्रदान करने से पूर्व अपने आप को संतुष्ट कर लेना चाहेगा कि वह जलधारा कूड़े-कचरे से मुक्त हो। यदि इसके निरीक्षण-परीक्षण पर वह जलधारा खरी उतरे, तो वह उसे आने देगा अन्यथा नहीं क्योंकि वह जानता है कि अपरीक्षित जल न केवल स्वयं गंददी से भरा हो सकता है बल्कि पूरी नदी को भी अपनी सड़ांद से भर डालने की क्षमता रखता है।
अंगरेजी के कुछ समर्थक हिन्दी पर अनम्यता और दूसरी भाषाओं के साथ मिलकर काम न करने का आरोप लगाते हैं। उन्हें संतुष्ट करने के लिए अरबी और फारसी के साथ बनाए गए शब्दों की लम्बी सूची बनाना या उनके बारे में अधिक लिखना पाठकों के सहजज्ञान का अपमान करने जैसा होगा। फिर भी प्रसंगवश एक शब्द तो यहां दिया ही जा सकता है: चौराहा शब्द को देखकर कितने लोग सोचते हैं कि वह दो भाषाओं के मिलन से बनाया गया है। इसी तरह अंगरेजी से मिलकर रेलगाड़ी, बमबारी, डाक्टरी और रेडियोधर्मी किरण जैसे अनेक शब्द हमने बनाए हैं। उनका प्रयोग करने में किसी भी हिन्दी भाषी को आपत्ति नहीं।
भारत की स्वंतरता पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया। तब पुरुषोत्तमदास टंडन, डाo राजेन्द्रप्रसाद आदि के प्रभाव से विद्यालयों में हिन्दी को शिक्षा का मुख्य माध्यम आरम्भ हुआ। सौभाग्यवश मैं उस पीढ़ी का व्यक्ति हूं जिसने गणित, भूगोल, भौतिकी और रसायनशास्त्र आदि विषय हिन्दी में पढ़े। जी हां, लघुत्तम, महत्तम, वर्ग, वर्गमूल, चक्रवर्ती ब्याज और अनुपात जैसे शब्दों से मैंने अंकगणित सीखा। उच्च गणित में समीकरण, ज्या, कोज्या, बल, शक्ति और बलों के त्रिभुजों का बोलबाला रहा। भूगोल पढ़ते समय उष्णकटिबंध, जलवायु, भूमध्यरेखा, ध्रुव और पठार जैसे शब्द बहुत सहजभाव से मेरे शब्द-भंडार का अंग बन गए। विज्ञान में द्रव्यमान, भार, गुरुत्वाकर्षण, व्यतक्रमानुपात, चुम्बकीय क्षेत्र, मिश्रण, यौगक और रसायनिक क्रिया आदि शब्दों ने मुझे कभी भी भयभीत नहीं किया। और न ही किसी व्यवसाय को चिकित्सक या लेखाकार घोषित करते हुए मेरे मन में किसी प्रकार का हीनभाव आया। मैं आज तक स्वयं को सिविल अभियंता (अंगरजी के साथ मिलाकर बनाया गया एक अन्य शब्द) कहने में गर्व अनुभव करता हूं।
जिनकी गोद में बैठकर आज की पीढ़ी ने कविता लिखनी सीखी उन्होंने बच्चों के लिए भूगोल (राधेश्याम शर्मा प्रगल्भ) और ऐतिहासिक घटनाओं (सुमित्राकुमारी चौहान व सोहनलाल द्विवेदी) आदि विषयों पर सरल और सुन्दर कविताएं लिखीं। जयशंकरप्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, मैथलीशरण गुप्त, देवराज दिनेश, रामधारी सिंह दिनकर और गोपालदास नीरज आदि को अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए अंगरेजी की शरण में जाने की आवश्यकता कभी अनुभव नहीं हुई। महादेवी वर्मा बिना अंगरेजी की सहायता के न केवल तारक मंडलों की यात्राएं करती रहीं, बल्कि जो भी उनके सम्पर्क में आया उसे पढ़ती भी रहीं। हरिवंशराय बच्चन ने अंगरेजी की सरिता में गोते तो खूब लगाए और अपने पाठकों के लिए उस सरिता के अनेक रत्न भी निकालकर सौंपे, परन्तु उस भाषा को अपने मूल लेखन में फटकने तक नहीं दिया। आचार्य चतुरसेन शास्त्री, वृन्दावनलाल वर्मा और प्रेमचन्द अपनी भाषा से करोड़ों पाठकों के पास पहुंचे। जहां एक ओर यशपाल, डाo धर्मवीर भारती, और सच्चिदानंद वात्सयायन अज्ञेय आदि का अंगरेजी से कोई झगड़ा नहीं हुआ, वहां दूसरी ओर उन्होंने अपने साहित्य में इस भाषा के शब्दों की आवश्यकता कभी नहीं समझी। डाo सत्यप्रकाश (गणित), डाo कार्तिकप्रसाद (तकनीकी विषय), श्यामसुन्दर शर्मा (विज्ञान-प्रगति) और जयप्रकाश भारती (विज्ञान) आदि अपने चुने हुए क्षेत्रों में जटिल विषयों पर धड़ल्ले से लिखते रहे। मैंने स्वयं भूगर्भशास्त्र पर हिन्दी की पहली पुस्तक ‘धरती की दैलत’ में धातुमेल (अलाँय) और ‘संसार के अनोखे पुल’ नामक पुस्तक में छज्जापुल (कैन्टीलीवर ब्रिज) और मेहराब (आर्च) जैसे शब्द प्रयोग किए, जिन्हें पाठक समझ गए।
निश्चय ही ऐसे भी अनेक सफल लेखक और कवि हुए हैं जिन्होंने अंगरेजी के शब्दों का सफलतापूर्वक उपयोग अपने साहित्य में किया है। काका हाथरसी की कविता में अंगरेजी के शब्द देखे जा सकते हैं। उल्लेखनीय यह है कि काका ने उन शब्दों का प्रयोग मुख्यतः तुकबन्दी के लिए किया और काफी हास्य सृजन भी उससे हुआ। क्या कोई यह कह सकता है कि यदि वे अंगरेजी के इन शब्दों का प्रयोग न करते, तो उनकी कविता में हास्य कम पड़ जाता? कुछ भी हो, उनकी कविता के पकवान में अंगरेजी शब्दों की चीनी पाठकों को प्रिय लगी। परन्तु अब कुछ लोग मात्र चीनी से ही हमें संतुष्ट करना चाहते हैं – मावा भूल जाइए, बस चीनी भर ही फंकिए। आखिर इस परिवर्तन का कारण क्या है?
बिना किसी मीठी लपेट लगाए मैं कहना चाहूंगा कि यह सब अंगरेजी के पक्षधरों के गुप्त षड़यन्त्र का परिणाम है। जिस भाषा को अस्थायी रूप से सहराष्ट्रभाषा की मान्यता दी गई थी, उसके प्रभावशाली अनुयायी एक ओर तो जय हिन्दी का नारा लगाते रहे और दूसरी ओर हिन्दी की जड़ें काटने में लगे रहे। उन्होंने धीरे-धीरे पहले उच्च शिक्षा ओर फिर बाद में माध्यमिक शिक्षा, हिन्दी के बदले अंगरेजी में दिए जाने में भरपूर शक्ति लगा दी। यदि हिन्दी भाषा किसी प्रकार उनके चंगुल से बच भी गई, तो तमाम अंगरेजी तकनीकी शब्द उसमें ठूंस दिए गए यह बहाना बनाकर कि हिन्दी के शब्द संस्कृतनिष्ट और जटिल हैं; भौतिकी कठिन है- फिजिक्स सरल है, विकल्प आंखों के आगे अंधेरा ला देता है- आल्टरनेटिव तो भारत का जन्मजात शिशु भी समझता है। धीरे-धीरे चलनेवाली इस मीठी छुरी से कटी भारत की भोली जनता पर इन पन्द्रह-बीस वर्षों में एक ऐसा मुखुर अल्पमत छा गया है, जो सड़क को रोड, बाएं-दाएं को लैफ्ट-राइट, परिवार को फैमली, चाचा-मामा को अंकल, रंग को कलर, कमीज को शर्ट, तश्तरी को प्लेट, डाकघर को पोस्ट आफिस और संगीत को म्यूजिक आदि शब्दों से ही पहचानता है। उनके सामने हिन्दी के साधारण से साधारण शब्द बोलिए, तो वे टिप्पणी करते हैं कि आप बहुत शुद्ध और क्लिष्ट हिन्दी बोलते हैं। यदि आप किसी पुरुष को सर या महिला को मैडम शब्द द्वारा संबोधित न करें, तो वे आपको ऐसे देखते हैं जैसे उनके सामने कोई अनपढ़ गंवार आ खड़ा हुआ हो।
वर्तमान भाषा नीति पर आधारित उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद इस अल्पमत के सदस्यों के लिए अंगरेजी शब्दों के फूलों की लड़ियां प्रयोग किए बिना चार वाक्य भी एक साथ हिन्दी में लिखना या बोलना कठिन दिखाई देता है। वे कहते हैं:
इक्सक्यूस मी, अभी आप पेशन्ट को नहीं देख सकते।
या
मैं कनाट प्लेस में ही शौपिंग करता हूं।
या
मेरा हसबैण्ड बिजनेसमैन है।
या
इन्डिया में बहौत प्रोग्रस हुई है।
यह भाषायी दिवालापन नहीं, तो और क्या है। एक संस्मरण: पिछले वर्ष ऐसे ही एक व्यक्ति ने दूरभाष पर मुझसे कहा: “मैंने सोचा कि आपको बर्थडे विश कर दूं ।” मैंने इन्हें उत्तर दिया कि आप मुझे विष देने के बदले अपनी शुभकामनाएं दें। अपने वाक्य के विद्रूप को सुनकर वे खूब हंसे और उन्होंने सौगंद खाई कि भविष्य में कभी भी किसी भी व्यक्ति को विष नहीं देंगे। क्या हिन्दी के सभी हितैषियों को ऐसा ही नहीं करना चाहिए?
हिन्दी की ऐसी दुर्दशा के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगाने के बदले यह कहीं अधिक उपयोगी होगा कि हम सभी हिन्दीप्रेमी एकजुट होकर नई पीढ़ी की भाषायी योग्यता को बढ़ाने का प्रयत्न करें। कुछ लाख लोगों को विदेश से विदेशीमुद्रा के थैले भरकर लाने या कालसैंटर – दूरभाष केन्द्र में बैठकर विदेशी ग्राहकों से अंगरेजी में बात करने की क्षमतावाले लोगों की सेना तैयार करने की धुन में हम भारत के करोड़ों युवक-यवतियों की शैक्षणिक आवश्यकताओं को अनदेखा कर रहे हैं। उनकी क्षमताओं का पूर्णतः विकास करने के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें राष्ट्रभाषा या मातृभाषा में शिक्षा दी जाए – प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च और तकनीकी शिक्षा तक। पहले उन्हें हिन्दी में सभी विषय पढ़ाइए, हिन्दी के शब्दों के साथ। तब देखिए कि उन्हें अंरेजी की कितनी आवश्यकता या मजबूरी - विवशता रह जाती है। हिन्दी केवल सड़कों पर ठुमका लगाते हुए चलचित्र बनाने वालों की भाषा नहीं है। न ही हिन्दी केवल उनके लिए है जो अपने कुछ मित्रों के साथ बैठकर वाह-वाह करने मात्र से संतुष्ट हो जाते हों, बल्कि उन सभी के लिए भी होनी चाहिए जिनमें अपना जीवन – विज्ञान, न्याय, शिक्षा, व्यवस्था, शोध और विकास की समस्त कार्यप्रणाली हिन्दी में कर सकने की क्षमता हो।
यदि हमने ऐसा नहीं किया, तो कुछ ही वर्षों में स्थिति इतनी बिगड़ जाएगी कि आज की हिन्दी समझने वाले लोग बचेंगे ही नहीं। अंगरेजी ही सब कुछ हो जाएगी – सहराष्ट्रभाषा के बदले वह राष्टट्रभाषा घोषित कर दी जाएगी। तब शायद हिन्दी लेखकों या कवियों की बात किसी की भी समझ में नहीं आएगी और हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं या पुस्तकों की आवश्यकता भी न रह जाएगी। आशा है कि हम सब मिलकर इस भंयकर संभावना को रोक सकेंगे।
10.8.10
26.4.10
मैं हिंदी हूँ !
विश्व के लगभग १३७ देशों में हमारे अनुयायी बसते हैं, वे मुझसे वेहद प्रेम करते हैं। १९९८ के पूर्व मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आँकडे उपलब्ध हुए, उनमें मैं तीसरे पायदान पर हूँ ।
प्रो. महावीर सरन जैन, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक ने यूनेस्को की टेक्नीकल कमेटी फार द वर्ल्ड लैंग्वेजज को प्रामाणिक आँकडों एवं तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया कि विश्व में चीनी के बाद दूसरा स्थान मेरा ही है ।
जापान में प्रोफेसर तनाकाजी ने बी.ए., एम.ए. स्तर की शिक्षा का पाठ्यक्रम इस विवेक व वयस्कता से तैयार किया है कि वह जापानी विद्यार्थी के मन में मेरे प्रति प्रेम जगाने के साथ उसके मानस में भारतीय संस्कृति - संवेदना, मिथक चेतना का उजला प्रकाश भर सके।
जापान में विदेशी भाषाओं के साथ उन देशों के शिष्टाचार, खानपान, वेशभूषा, गीत, बोली-बानी से अंतरंगता स्थापित करने के लिए विद्यार्थी संस्कृति दिवस मनाते हैं। हिन्दी पढने वाली जापानी लडकियाँ साडी पहनकर तथा अन्य भारतीय वस्त्र धारण कर विश्व विद्यालय केम्पस में आती हैं।
इंग्लैंड के कैंब्रिज, ऑक्सफोर्ड, लंदन व यॉर्क विश्व विद्यालयों में मेरी पढाई होती है।
लंदन विश्वविद्यालय के प्राच्य एवं अफ्रीकी अध्ययन स्कूल में भी मेरी पढाई विधिवत् चलती है। इंग्लैण्ड, वेल्स, स्कॉटलैंड के स्कूलों, मिडलैंड के विभिन्न शहरों, उत्तर के ब्रैडफोड के हिन्दू मंदिरों में बच्चे मुझे पढते हैं।
कनाडा में लगभग बीस वर्षों से हिन्दू इंस्टिट्यूट ऑफ लर्निंग टोरंटो में सक्रिय है। इस संस्था के अध्यक्ष श्री जगदीश चन्द्र शारदा व प्रधानाचार्य रत्नाकर नराले हैं। इस संस्था का मुख्य कार्य मेरा प्रसार करना है, साथ ही संस्कृत, गीता, रामायण का भी प्रचार-प्रसार करती है।
मॉरीशस ने मुझे बहुत सम्मान दिया है -
वहां २५४ प्राथमिक विद्यालयों में, ५८५ अध्यापक व ४८,८४२ छात्र मुझे सीख रहे हैं। ६४ माध्यमिक विद्यालयों में मेरी दीप शिखा प्रज्वलित है। गैर सरकारी विद्यालयों में ६२ विद्यालयों में ५२०० छात्र मेरे उन्नयन की दिशा में अध्ययनरत हैं।
मॉरीशस की संसद ने १२ नवम्बर २००२ को एक अधिनियम के द्वारा विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना की।
इटली में वेनिस, टूरिन तथा रोम में मेरी पढाई होती है । ओरिएंटल विश्वविद्यालय नेपोली (नेपुल्स), टूरिन, वेनिस, रोम विश्वविद्यालयों में शिक्षण कार्य होता है। एक साल में मेरी पढाई के आधारभूत व्याकरण के नियमों से परिचित करा दिया जाता है। भारत के बाहर यूरोप में इटली ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ पाँच विश्वविद्यालयों में सुचारू रूप से मेरी पढाई होती है ।
नीदरलैंड्स में हिन्दी प्रचार संस्था लायडन विश्वविद्यालय, हिन्दू ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन ओहम् डच हिन्दी समिति, लायडन आदि अनेक संस्थाएँ मिलजुलकर मेरे प्रचार-प्रसार के लिए कार्यरत हैं। प्रवासी भारतीय मेरी पुस्तकें मँगाते हैं, मंदिरों, स्कूलों, भजन-कीर्तनों, संस्कार गीतों में मेरा ही उपयोग करते हैं। उनका कहना है कि यदि हमने आने वाली पीढी को हिन्दी सीखने के लिए प्यार से प्रेरित नहीं किया तो हिन्दी और सरनामी भाषाएँ समाप्त हो जाएँगी। डच तो रोटी रोजी की भाषा है परन्तु तुर्की व मोरक्को की तीसरी पीढी अभी तक गर्व से अपनी भाषा बोलती है जबकि भारतवंशीय क्यों पिछड रहे ?
सरनामी में मैं एक समृद्ध भाषा हूँ । जापान में प्रो. तोषियो तनाका हिन्दी के विद्वान् के रूप में विख्यात हैं। उन्होंने हाकुसुइशा (हिन्दी प्रवेश), इंदो नो शूक्यो तो गेई जित्सु (भारत के धर्म और कलाएँ) जैसी पुस्तकें तैयार की हैं।
मास्को के जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केन्द्र ने हिन्दी रूसी शब्दकोश का प्रकाशन किया है। रूसी विद्वान् जाल्मन दीप शित्स का हिन्दी व्याकरण एक मानक ग्रन्थ है। प्रो. येवोनी येलिशेव ने सुमित्रा नन्दन पंत और आधुनिक हिन्दी कविता शीर्षक से आलोचनात्मक पुस्तक लिखी है। रूसी आलोचक अलेक्सांद्र की पुस्तक ? समकालीन हिन्दी साहित्य और समाज? के अन्तर्सम्बन्ध को नई दृष्टि से परिभाषित करती है।
यह विचित्र किन्तु सत्य है कि जहां की मैं मूल निवासी हूँ वहां मेरे निवासी होने पर ही प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है जबकि परदेशी लोग मेरे होने के एहसास मात्र से ही रोमांचित हो जाते हैं, है न विडंबना ?
सोचिये बार-बार सोचिये ऐसा क्यों है ?
प्रो. महावीर सरन जैन, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक ने यूनेस्को की टेक्नीकल कमेटी फार द वर्ल्ड लैंग्वेजज को प्रामाणिक आँकडों एवं तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया कि विश्व में चीनी के बाद दूसरा स्थान मेरा ही है ।
जापान में प्रोफेसर तनाकाजी ने बी.ए., एम.ए. स्तर की शिक्षा का पाठ्यक्रम इस विवेक व वयस्कता से तैयार किया है कि वह जापानी विद्यार्थी के मन में मेरे प्रति प्रेम जगाने के साथ उसके मानस में भारतीय संस्कृति - संवेदना, मिथक चेतना का उजला प्रकाश भर सके।
जापान में विदेशी भाषाओं के साथ उन देशों के शिष्टाचार, खानपान, वेशभूषा, गीत, बोली-बानी से अंतरंगता स्थापित करने के लिए विद्यार्थी संस्कृति दिवस मनाते हैं। हिन्दी पढने वाली जापानी लडकियाँ साडी पहनकर तथा अन्य भारतीय वस्त्र धारण कर विश्व विद्यालय केम्पस में आती हैं।
इंग्लैंड के कैंब्रिज, ऑक्सफोर्ड, लंदन व यॉर्क विश्व विद्यालयों में मेरी पढाई होती है।
लंदन विश्वविद्यालय के प्राच्य एवं अफ्रीकी अध्ययन स्कूल में भी मेरी पढाई विधिवत् चलती है। इंग्लैण्ड, वेल्स, स्कॉटलैंड के स्कूलों, मिडलैंड के विभिन्न शहरों, उत्तर के ब्रैडफोड के हिन्दू मंदिरों में बच्चे मुझे पढते हैं।
कनाडा में लगभग बीस वर्षों से हिन्दू इंस्टिट्यूट ऑफ लर्निंग टोरंटो में सक्रिय है। इस संस्था के अध्यक्ष श्री जगदीश चन्द्र शारदा व प्रधानाचार्य रत्नाकर नराले हैं। इस संस्था का मुख्य कार्य मेरा प्रसार करना है, साथ ही संस्कृत, गीता, रामायण का भी प्रचार-प्रसार करती है।
मॉरीशस ने मुझे बहुत सम्मान दिया है -
वहां २५४ प्राथमिक विद्यालयों में, ५८५ अध्यापक व ४८,८४२ छात्र मुझे सीख रहे हैं। ६४ माध्यमिक विद्यालयों में मेरी दीप शिखा प्रज्वलित है। गैर सरकारी विद्यालयों में ६२ विद्यालयों में ५२०० छात्र मेरे उन्नयन की दिशा में अध्ययनरत हैं।
मॉरीशस की संसद ने १२ नवम्बर २००२ को एक अधिनियम के द्वारा विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना की।
इटली में वेनिस, टूरिन तथा रोम में मेरी पढाई होती है । ओरिएंटल विश्वविद्यालय नेपोली (नेपुल्स), टूरिन, वेनिस, रोम विश्वविद्यालयों में शिक्षण कार्य होता है। एक साल में मेरी पढाई के आधारभूत व्याकरण के नियमों से परिचित करा दिया जाता है। भारत के बाहर यूरोप में इटली ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ पाँच विश्वविद्यालयों में सुचारू रूप से मेरी पढाई होती है ।
नीदरलैंड्स में हिन्दी प्रचार संस्था लायडन विश्वविद्यालय, हिन्दू ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन ओहम् डच हिन्दी समिति, लायडन आदि अनेक संस्थाएँ मिलजुलकर मेरे प्रचार-प्रसार के लिए कार्यरत हैं। प्रवासी भारतीय मेरी पुस्तकें मँगाते हैं, मंदिरों, स्कूलों, भजन-कीर्तनों, संस्कार गीतों में मेरा ही उपयोग करते हैं। उनका कहना है कि यदि हमने आने वाली पीढी को हिन्दी सीखने के लिए प्यार से प्रेरित नहीं किया तो हिन्दी और सरनामी भाषाएँ समाप्त हो जाएँगी। डच तो रोटी रोजी की भाषा है परन्तु तुर्की व मोरक्को की तीसरी पीढी अभी तक गर्व से अपनी भाषा बोलती है जबकि भारतवंशीय क्यों पिछड रहे ?
सरनामी में मैं एक समृद्ध भाषा हूँ । जापान में प्रो. तोषियो तनाका हिन्दी के विद्वान् के रूप में विख्यात हैं। उन्होंने हाकुसुइशा (हिन्दी प्रवेश), इंदो नो शूक्यो तो गेई जित्सु (भारत के धर्म और कलाएँ) जैसी पुस्तकें तैयार की हैं।
मास्को के जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केन्द्र ने हिन्दी रूसी शब्दकोश का प्रकाशन किया है। रूसी विद्वान् जाल्मन दीप शित्स का हिन्दी व्याकरण एक मानक ग्रन्थ है। प्रो. येवोनी येलिशेव ने सुमित्रा नन्दन पंत और आधुनिक हिन्दी कविता शीर्षक से आलोचनात्मक पुस्तक लिखी है। रूसी आलोचक अलेक्सांद्र की पुस्तक ? समकालीन हिन्दी साहित्य और समाज? के अन्तर्सम्बन्ध को नई दृष्टि से परिभाषित करती है।
यह विचित्र किन्तु सत्य है कि जहां की मैं मूल निवासी हूँ वहां मेरे निवासी होने पर ही प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है जबकि परदेशी लोग मेरे होने के एहसास मात्र से ही रोमांचित हो जाते हैं, है न विडंबना ?
सोचिये बार-बार सोचिये ऐसा क्यों है ?
12.4.10
भानु प्रताप ने शुरू की पत्रिका समूह संग नई पारी
Wednesday, 07 April 2010 15:00 B4M भड़ास4मीडिया - प्रिंट
डा. भानु प्रताप सिंह
हिंदुस्तान अखबार में शीर्ष संपादकीय नेतृत्व बदलने के बाद से उपेक्षा का दंश झेल रहे भानु प्रताप सिंह ने नई पारी की शुरुआत कर दी है. उन्होंने पत्रिका ग्रुप ज्वाइन कर लिया है. उन्हें आगरा व अलीगढ़ मंडल का ब्यूरो चीफ बनाया गया है.
वे आगरा में ही बैठेंगे. पत्रिका ने यह नियुक्ति ग्वालियर में अपना एडिशन शुरू करने के क्रम किया है. मृणाल पांडेय के समय में भानु हिंदुस्तान, आगरा के लिए अप्वाइंट हुए थे. बाद में उन्हें अलीगढ़ का ब्यूरो चीफ बना दिया गया था. इस बीच, जब शशि शेखर एंड कंपनी हिंदुस्तान में आई तो पुराने लोगों की उपेक्षा का जो दौर शुरू हुआ, उसमें भानु भी शामिल कर लिए गए. भानु को अलीगढ़ से हटाकर आगरा बुला लिया गया और एक तरह से साइडलाइन कर छोड़ दिया गया. इससे आजिज आकर भानु ने इस्तीफा दे दिया. नौकरी छोड़ने के बाद अध्ययन -अध्यापन में जुटे डा. भानु ने फिर से आगरा में ही देश के प्रतिष्ठित अखबार समूहों में से एक पत्रिका ग्रुप के साथ नई पारी की शुरुआत कर दी है.
डा. भानु 20 वर्षों से पत्रकारिता में हैं. वे हिंदुस्तान, आगरा और अलीगढ़ की लांचिंग कोर टीम के सदस्य रहे हैं. आगरा में वे दैनिक जागरण व अमर उजाला, दोनों अखबारों के साथ लंबी पारी खेल चुके हैं. राष्ट्रीय सहारा में भी काम कर चुके हैं. एमबीए के बाद प्रबंधन विषय में हिंदी माध्यम से पीएचडी करने वाले भानु की 3000 से अधिक बाईलाइन खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं. भानु की लिखी चार किताबें जल्द ही प्रकाशित होने वाली हैं.
Comments (22)
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...written by chaman sharma, April 07, 2010
Best of luck BHANU bhai sahab
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...written by Ajay , April 08, 2010
कुछ धुरबाजों को अफसोस तो बहुत हुआ होगा लेकिन भानु जी जैसे व्यक्ति इस सबसे ऊपर उठ चुके हैं.. आगरा के लोग उनकी लेखनी को लम्बे समय से मिस कर रहे थे.. अब उनकी कलम का कमाल दुनिया देखेगी.. !
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...written by Naseem faruki, April 08, 2010
Dear Bhanu ji ek patrakar ki sabse badi peeda hai uski upeksha ak samay ke baad journalist ki chahat hoti hai ki use ek mukaam mile aapne bahut aacha kiya. patrika group me aap ke saath nyaya hoga. Chhattishgarh me patrika group jaldi aaye ye hamari ekcha hai.
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...written by d-waker, April 08, 2010
asha hi nahi viswhas hai ki aap jaise loog patrika ko or adhik bulandi per lejayenge. apko or patrika ko shubhkamnaye- d-wakar
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...written by rajeev tiwari, April 08, 2010
welcome in agra. we wer missing yoy in agra. hope we will read good stories again.
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...written by little, April 08, 2010
kisi bhi akhbar me rahiye, agra me rahiye. ap jahan, hum wahan.bhanu bhai hume apka lambe samay se intzar tha.
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...written by garima, April 08, 2010
bhanu bhai apne to kamal hi kar diya. ap jaise journlist ki agra me hi jarurat h. hindustan ko agra me jamane ke liye apne bahut mehnat ki thi. hume to hindustan ka jabardasti grahak banaya tha.
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...written by shildhar, April 08, 2010
aise hi aage badhte rahiye sir. lekin hume yaad jarur rakhiyega. badhai
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...written by deoki, April 08, 2010
congratulation dear. ap aki lekhni ko nation me jana jayega.
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...written by kk goyal, April 08, 2010
best of luck bhanuji, sorry dr bhanuji. hope you will creat best. agra needs you. kk goyal
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...written by abhinav, April 08, 2010
welcome in agra bhanuji.
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...written by harikant, April 08, 2010
very good, again in agra. patrika is rich now.
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...written by dr vm katoch, April 08, 2010
hurrey, meet u soon.
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...written by yatish lavania, April 08, 2010
Indian photo journlist ki taraf se nai pari ki shuruat ko badhai.
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...written by Deepak Mishra, April 08, 2010
Many congratulations Bhanu ji.
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...written by dr bhanu pratap singh, April 09, 2010
shubhchintakon ka dil se abhaaaaaaaaaaaaaaar. dr bhanu pratap singh
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...written by satendra kulshrrshtha, April 09, 2010
best of luck sir....dhamake ke sath nyi pari ka aagaj kariye.........
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...written by Manisha Upadhaya, April 09, 2010
supj ko rosni ki jrurat nahi hoti h bhanu h roshan to hona hi tha koi grahan bhanu ko nahi chhipa sakta h
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...written by manoj mishra, April 10, 2010
badhai ho nai pari ke liye
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...written by Rishabh K Jain, April 11, 2010
Bhanu ji Aapko Patrika join karne ki Subhkamnay -rishabh jain, Agra
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...written by Rishabh K Jain, April 11, 2010
Bahut Top Bhanu Ji
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...written by Ashok bansal, April 11, 2010
Bhanu ko me janata hun. Honest and Hard working. Struggle kiya hai. Aage jayange. Ashok Mathura
Wednesday, 07 April 2010 15:00 B4M भड़ास4मीडिया - प्रिंट
डा. भानु प्रताप सिंह
हिंदुस्तान अखबार में शीर्ष संपादकीय नेतृत्व बदलने के बाद से उपेक्षा का दंश झेल रहे भानु प्रताप सिंह ने नई पारी की शुरुआत कर दी है. उन्होंने पत्रिका ग्रुप ज्वाइन कर लिया है. उन्हें आगरा व अलीगढ़ मंडल का ब्यूरो चीफ बनाया गया है.
वे आगरा में ही बैठेंगे. पत्रिका ने यह नियुक्ति ग्वालियर में अपना एडिशन शुरू करने के क्रम किया है. मृणाल पांडेय के समय में भानु हिंदुस्तान, आगरा के लिए अप्वाइंट हुए थे. बाद में उन्हें अलीगढ़ का ब्यूरो चीफ बना दिया गया था. इस बीच, जब शशि शेखर एंड कंपनी हिंदुस्तान में आई तो पुराने लोगों की उपेक्षा का जो दौर शुरू हुआ, उसमें भानु भी शामिल कर लिए गए. भानु को अलीगढ़ से हटाकर आगरा बुला लिया गया और एक तरह से साइडलाइन कर छोड़ दिया गया. इससे आजिज आकर भानु ने इस्तीफा दे दिया. नौकरी छोड़ने के बाद अध्ययन -अध्यापन में जुटे डा. भानु ने फिर से आगरा में ही देश के प्रतिष्ठित अखबार समूहों में से एक पत्रिका ग्रुप के साथ नई पारी की शुरुआत कर दी है.
डा. भानु 20 वर्षों से पत्रकारिता में हैं. वे हिंदुस्तान, आगरा और अलीगढ़ की लांचिंग कोर टीम के सदस्य रहे हैं. आगरा में वे दैनिक जागरण व अमर उजाला, दोनों अखबारों के साथ लंबी पारी खेल चुके हैं. राष्ट्रीय सहारा में भी काम कर चुके हैं. एमबीए के बाद प्रबंधन विषय में हिंदी माध्यम से पीएचडी करने वाले भानु की 3000 से अधिक बाईलाइन खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं. भानु की लिखी चार किताबें जल्द ही प्रकाशित होने वाली हैं.
Comments (22)
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...written by chaman sharma, April 07, 2010
Best of luck BHANU bhai sahab
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...written by Ajay , April 08, 2010
कुछ धुरबाजों को अफसोस तो बहुत हुआ होगा लेकिन भानु जी जैसे व्यक्ति इस सबसे ऊपर उठ चुके हैं.. आगरा के लोग उनकी लेखनी को लम्बे समय से मिस कर रहे थे.. अब उनकी कलम का कमाल दुनिया देखेगी.. !
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...written by Naseem faruki, April 08, 2010
Dear Bhanu ji ek patrakar ki sabse badi peeda hai uski upeksha ak samay ke baad journalist ki chahat hoti hai ki use ek mukaam mile aapne bahut aacha kiya. patrika group me aap ke saath nyaya hoga. Chhattishgarh me patrika group jaldi aaye ye hamari ekcha hai.
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...written by d-waker, April 08, 2010
asha hi nahi viswhas hai ki aap jaise loog patrika ko or adhik bulandi per lejayenge. apko or patrika ko shubhkamnaye- d-wakar
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...written by rajeev tiwari, April 08, 2010
welcome in agra. we wer missing yoy in agra. hope we will read good stories again.
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...written by little, April 08, 2010
kisi bhi akhbar me rahiye, agra me rahiye. ap jahan, hum wahan.bhanu bhai hume apka lambe samay se intzar tha.
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...written by garima, April 08, 2010
bhanu bhai apne to kamal hi kar diya. ap jaise journlist ki agra me hi jarurat h. hindustan ko agra me jamane ke liye apne bahut mehnat ki thi. hume to hindustan ka jabardasti grahak banaya tha.
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...written by shildhar, April 08, 2010
aise hi aage badhte rahiye sir. lekin hume yaad jarur rakhiyega. badhai
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...written by deoki, April 08, 2010
congratulation dear. ap aki lekhni ko nation me jana jayega.
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...written by kk goyal, April 08, 2010
best of luck bhanuji, sorry dr bhanuji. hope you will creat best. agra needs you. kk goyal
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...written by abhinav, April 08, 2010
welcome in agra bhanuji.
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...written by harikant, April 08, 2010
very good, again in agra. patrika is rich now.
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...written by dr vm katoch, April 08, 2010
hurrey, meet u soon.
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...written by yatish lavania, April 08, 2010
Indian photo journlist ki taraf se nai pari ki shuruat ko badhai.
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...written by Deepak Mishra, April 08, 2010
Many congratulations Bhanu ji.
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...written by dr bhanu pratap singh, April 09, 2010
shubhchintakon ka dil se abhaaaaaaaaaaaaaaar. dr bhanu pratap singh
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...written by satendra kulshrrshtha, April 09, 2010
best of luck sir....dhamake ke sath nyi pari ka aagaj kariye.........
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...written by Manisha Upadhaya, April 09, 2010
supj ko rosni ki jrurat nahi hoti h bhanu h roshan to hona hi tha koi grahan bhanu ko nahi chhipa sakta h
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...written by manoj mishra, April 10, 2010
badhai ho nai pari ke liye
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...written by Rishabh K Jain, April 11, 2010
Bhanu ji Aapko Patrika join karne ki Subhkamnay -rishabh jain, Agra
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...written by Rishabh K Jain, April 11, 2010
Bahut Top Bhanu Ji
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...written by Ashok bansal, April 11, 2010
Bhanu ko me janata hun. Honest and Hard working. Struggle kiya hai. Aage jayange. Ashok Mathura
28.3.09
जारी है हिन्दी की सहजता को नष्ट करने की साजिश*
चिन्मय मिश्र*नई दिल्ली, 13 सितम्बर (आईएएनएस)। मुक्तिबोध के एक लेख का शीर्षक है ''अंग्रेजी जूते में हिंदी को फिट करने वाले ये भाषाई रहनुमा।'' यह लेख उस प्रवृत्ति पर चोट है जो कि हिंदी को एक दोयम दर्जे की नई भाषा मानती है और हिंदी की शब्दावली विकसित करने के लिए अंग्रेजी को आधार बनाना चाहती है।भाषा विज्ञानियों का एक बड़ा वैश्विक वर्ग जिसमें नोम चॉमस्की भी शामिल हैं हिंदी की प्रशंसा में कहते हैं कि यह इस भाषा का कमाल है कि इसमें उद्गम के मात्र एक सौ वर्ष के भीतर कविता रची जाने लगी, परंतु वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि पिछले एक हजार वर्षो से अधिक से भारत में हिंदी का व्यापक उपयोग होता रहा है। अपभ्रंश से प्रारंभ हुआ यह रचना संसार आज परिपक्वता के चरम पर है।अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व ही हिंदी की उपयोगिता सिद्ध हो चुकी थी। तत्कालीन भारत विश्व व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण भागीदार था अतएव यह आवश्यक था कि इस देश के साथ व्यवहार करने के लिए यहां की भाषा का ज्ञान हो। गौरतलब है कि अंग्रेजी को विश्वभाषा के रूप में मान्यता भारत पर इंग्लैंड द्वारा कब्जे के बाद ही मिल पाई थी।दिनेशचंद्र सेन ने हिस्ट्री ऑफ बेंगाली लेंगवेज एंड लिटरेचर (बंगाली भाषा और साहित्य का इतिहास)नामक पुस्तक में लिखा है 'अंग्रेजी राज के पहले बांग्ला के कवि हिंदुस्तानी सीखते थे।' इसी क्रम में वे आगे लिखते हैं 'दिल्ली के मुसलमान शहंशाह के एकछत्र शासन के नीचे हिंदी सारे भारत की सामान्य भाषा (लिंगुआ फ्रांका) हो गई थी।'हिंदी की व्यापकता के लिए एक और उदाहरण का सहारा लेते हैं। इलाहाबाद स्थित संत पौलुस प्रकाशन ने 1976 में 'हिंदी के तीन आरम्भिक व्याकरण' नामक ग्रंथ का प्रकाशन किया। ये तीनों व्याकरण हिंदी भाषा के हैं और सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में विदेशियों द्वारा लिखे गए थे। इन व्याकरणों से खड़ी बोली हिंदी के प्रसार और उसके रूपों के बारे में बहुत दिलचस्प तथ्य हमारे सामने आते हैं। इनमें पहला व्याकरण जौन जोशुआ केटलर ने डच में 17वीं के उत्तरार्ध का है।केटलर पादरी थे और उनका संबंध डच (हालैंड) ईस्ट इंडिया कंपनी से था। इसमें भाषा की जिस अवस्था का वर्णन है वह16 वीं सदी के उत्तरार्ध की है। दूसरा व्याकरण बेंजामिन शुल्ज का है जो 1745 ई. में प्रकाशित हुआ था। इसका विशेष संबंध हैदराबाद से था, इसलिए उनकी पुस्तक को दक्खिनी हिंदी का व्याकरण भी कह सकते हैं। तीसरा व्याकरण कासियानो बेलागात्ती का है और इसका संबंध बिहार से विशेष था।यहां पर एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य पर गौर करना आवश्यक है कि तीनों व्यक्ति पादरी थे। वे यूरोप के विभिन्न देशों से यहां आए थे और ईसाई धर्म का प्रचार ही उनका मुख्य उद्देश्य भी था। इसमें से दो व्याकरण लेटिन में लिखे गए और तीसरे का लेटिन में अनुवाद हुआ। तब तक अंग्रेजी धर्मप्रचार की भाषा नहीं थी न ही वह अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त कर पाई थी।ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये तीनों पादरी नागरी लिपि का भी परिचय देते हैं और बेलागात्ती ने अपनी पुस्तक केवल इस लिपि का परिचय देने को ही लिखी है। अपनी बात को और विस्तार देते हुए डा. रामविलास शर्मा लिखते है 'पादरी चाहे हैदराबाद में काम करे, चाहे पटना में और चाहे आगरा में, उसे नागरी लिपि का ज्ञान अवश्य होना चाहिए।' यह बात 17 वीं व 18 वीं शताब्दी की है।बेलागात्ती हिंदुस्तानी भाषा और नागरी लिपि के व्यवहार क्षेत्र के बारे में लिखते है, 'हिंदुस्तानी भाषा जो नागरी लिपियों में लिखी जाती है पटना के आस-पास ही नहीं बोली जाती है अपितु विदेशी यात्रियों द्वारा भी जो या तो व्यापार या तीर्थाटन के लिए भारत आते हैं प्रयुक्त होती है।' 1745 ई.में हिंदी का दूसरा व्याकरण रचने वाले शुल्ज ने लिखा है '18 वीं सदी में फारसी भाषा और फारसी लिपि का प्रचार पहले की अपेक्षा बढ़ गया था।पर इससे पहले क्या स्थिति थी? इस पर शुल्ज का मत है 'समय की प्रगति से यह प्रथा इतनी प्रबल हो गई कि पुरानी देवनागरी लिपि को यहां के मुसलमान भूल गए।' इसका अर्थ यह हुआ कि इससे पहले हिंदी प्रदेश के मुसलमान नागरी लिपि का व्यवहार करते थे। जायसी ने अखरावट में जो वर्ण क्रम दिया है, उससे भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। मुगल साम्राज्य के विघटन काल में यह स्थिति बदल गई। हम सभी इस बात को समझें कि हिंदी एक समय विश्व की सबसे लोकप्रिय भाषाओं में रही है और उसका प्रमाण है भारत का विशाल व्यापारिक कारोबार। जैसे-जैसे मुगल शासन शक्ति संपन्न होते गए वैसे-वैसे भारत का व्यापार भी बढ़ा और हिंदी की व्यापकता में भी वृद्धि हुई थी।क्या इसका यह अर्थ निकाला जाए कि किसी देश की समृद्धि ही उसकी भाषा को सर्वज्ञता प्रदान करती है। भारत व इंग्लैंड के संदर्भ में तो यह बात कुछ हद तक ठीक उतरती है। हिंदी जहां व्यापार की भाषा रही, वहीं उसका दूसरा स्वरूप आजादी के संघर्ष में भी हमारे सामने आता है। महात्मा गांधी ने जिस तरह हिंदी को देश की भाषा बनाने का उपक्रम किया उसने एक बार पुन: हिंदी को वैश्विक परिदृश्य पर ला दिया था । गांधी की भारत वापसी के पश्चात का काल हिंदी की पुनर्स्थापना का काल भी रहा है। वैसे इसका श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र को दिया जाना चाहिए, जिन्होंने लिखा था -निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति कौ मूल।बिनु निजभाषा ज्ञान के, मिटै न हिय कौ शूल।इस पर पं.हजारी प्रसाद द्विवेदी की बहुत ही सागरर्भित टिप्पणी है। वे लिखते हैं, 'उन्होंने निज भाषा 'शब्द का व्यवहार किया है, 'मिली-जुली', 'आम फहम', 'राष्ट्रभाषा' आदि शब्दों को नहीं। प्रत्येक जाति की अपनी भाषा है और वह निज भाषा की उन्नति के साथ उन्नत होती है।' इसी परम्परा के विस्तार को वे हिंदी का जन आंदोलन की संज्ञा भी देते हैं।आजादी के संघर्ष के दौरान ही पढ़े-खिले समुदाय का एक वर्ग अंग्रेजी को 'आभिजात्य' भाषा के रूप में स्वीकार कर चुका था। भारत की आजादी के पश्चात यह आभिजात्य वर्ग एक तरह के पारम्परिक 'कुलीन वर्ग' में परिवर्तित हो गया और उसने अपनी कुलीनता को ही इस देश की नियति निर्धारण का पैमाना बना दिया। इस दौरान षड़यंत्र के तहत हिंदी-उर्दू और हिंदी बनाम भारत की अन्य भाषाओं का मुद्दा अनावश्यक रूप से उछाला गया। ध्यान देने योग्य है कि मुगलकाल तक, जब हिंदी पूरे देश में व्यवहार में आ रही थी तब भी बंगला, तमिल, उड़िया तेलुगु जैसी भाषाएं अपने अंचलों में पूरे परिष्कार से न केवल स्वयं को संवार रही थीं बल्कि अपनी संस्कृति का निर्माण भी कर रही थीं।इस संदर्भ में हिंदी पर यह आरोप भी लगता है कि हिंदी की सबसे बड़ी विफलता यह है कि वह अपनी संस्कृति विकसित नहीं कर पाई, परंतु ध्यानपूर्वक अध्ययन से ऐसा भी भान होता है कि संभवत: हिंदी को कभी भी अपनी पृथक संस्कृति निर्मित करने की आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई होगी। अवधी, भोजपुरी, ब्रज जैसी संस्कृतियों ने सम्मिलित रूप से व्यापक स्तर पर हिंदी संस्कृति के निर्माण में कहीं न कहीं योगदान दिया है।कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी अगर अपनी पृथक संस्कृति के निर्माण के प्रति सचेत होती तो संभवत: भारत में इतनी विविधता भी नहीं होती और वह भी एकरसता वाला देश बन कर रह जाता। भारत के पूरे व्यापार का माध्यम होने के बावजूद एकाधिकारी प्रवृत्ति से बचे रहने से बढ़ा कार्य कोई समाज नहीं कर सकता था। हिंदी समाज ने इस असंभव को संभव कर दिखाया है।आज जब हिंदी पुन: बाजार की भाषा बन गई है तब विदेशी व्यापारिक हथकंडों से लैस एक वर्ग इसमें अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप कर इसकी सहजता को नष्ट कर देना चाहता है। दु:ख इस बात का है कि हिंदी को समझने व व्यवहार में लाने वाला प्रबुद्धतम वर्ग भी इसमें षड़यंत्रपूर्वक सम्मिलित हो गया है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि इसके लोकव्यापी स्वरूप को बचाए रखा जाए। पिछले एक हजार साल हिंदी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद स्वयं को भारतीय संस्कृति का पर्याय बनाए हुए है और यहां पर निवास करने वाला समाज इसका यह स्वरूप हमेशा बनाए भी रखेगा।इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
16.3.09
सीनियर रिपोटर्र की सोच
लालटेन जलाई तेरी, लालटेन बुझाऊँ तेरी
एकई खबर में मिट्टी में मिलाय दऊँ
बात न जो मानै मेरी, कर दऊँ में ख्वारी तेरी
सारे सहर में रायतौ सौ फैलाय दऊँ।
आवन दै अपने तू अध्यक्ष महोदय कूँ।
बाके आगे तेरी सारी बत्ती मैं बुझाय दऊँ।
डॉ. भानु प्रताप सिंह
डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट भानुहिन्दुस्तान डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम
एकई खबर में मिट्टी में मिलाय दऊँ
बात न जो मानै मेरी, कर दऊँ में ख्वारी तेरी
सारे सहर में रायतौ सौ फैलाय दऊँ।
आवन दै अपने तू अध्यक्ष महोदय कूँ।
बाके आगे तेरी सारी बत्ती मैं बुझाय दऊँ।
डॉ. भानु प्रताप सिंह
डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट भानुहिन्दुस्तान डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम
15.3.09
भारत के कर्णधारों से करबद्ध प्रार्थना
हमारे देश की लगभग २० प्रतिशत जनसंख्या ही अंग्रेजी समझ सकती है। शेष जनसंख्या हिन्दी ही जानने वाली है। आप सभी से प्रार्थना है कि देश की बहुसंख्यक जनता के लिए तथा राष्ट्रभाषा के सम्मान के लिए हिन्दी भाषा एवं देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करें। हमारे देश की प्रान्तीय भाषाएं भी अत्यन्त प्रिय, मधुर व संस्कृत मिश्रित हैं। देश के सभी लोगों को प्रान्तीय भाषाओं का भी आदर करना चाहिए तथा कुछ वाक्य प्रत्येक प्रन्तीय भाषा के अवश्य सीख लेना चाहिए जिससे उस प्रान्त में जाने के बाद या उस प्रान्त के किसी व्यक्ति से मिलने पर दो-चार वाक्य बोल सकें।
आज विश्व भाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रचलन बढ़ रहा है। अंग्रेजी पढ़ना, उसका ग्याता होना बुरी बात नहीं है। किन्तु राष्ट्रभाषा हिन्दी बोलने एवं लिखने में हमें गर्व का अनुभव करना चाहिए। बहुत से ऐसे लोग हैं जो अंग्रेजी के विद्वान होते हुए भी घर अथवा बाहर हिन्दी का ही प्रयोग लिखने व बोलने में करते है। वर्तमान में, विदेशों में जाने के बाद या यहाँ भी जो विदेशी कम्पनियाँ हैं, वे सभी कार्य अंग्रेजी में ही करती हैं, सेवा में भी अंग्रेजी जानने वालों को ही रखा जाता है। अतः अंग्रेजी का सीखना व जानना बुरा नहीं हैं। किन्तु प्रत्येक नागिरक को बोलने एवं लिखने में अपनी राष्ट्रभाषा का ही प्रयोग करना चाहिए।
मेरी संसद सदस्यों से भी करबद्ध प्रार्थना है कि वे भी हिन्दी या प्रान्तीय भाषाओं में ही बोलें। इससे देशवासी भी दूरदर्शन के माध्यम से प्रान्तीय भाषाओं का आनन्द ले सकेंगे। दूरदर्शन व आकाशवाणी से यह प्रार्थना है कि वे भी अपने प्रासारणा में हिन्दी व प्रान्तीय भाषा का ध्यान अवश्य रखें।
विभिन्न वस्तुओं के निर्माताओं पर विवरणा ऊपर हिन्दी में, नीचे प्रान्तीय भाषा में तथा उसके नीचे अंग्रेजी भाषा में लिखना चाहिए ताकि बहुसंखयक लोग उसे पढ़कर उपयोग में ला सकें। विदेशी कम्पिनयों से भी प्रार्थना है कि वे भारत की राष्ट्रभाषा का सम्मान करते हुए हिन्दी भाषा का ही लिखने एवं बोलने में प्रयोग करें।
जो विद्यालय अंग्रेजी माध्यम हैं, वे भी राष्ट्रभाषा हिन्दी पर विशेष ध्यान दें तथा अंकों को भी देवनागरी लिपि के अनुसार पढ़ायें । उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों से भी प्रार्थना है कि वे हिन्दी भाषा में ही बोलें एवं इसी में गर्व का अनुभाव करें।
डॉ० कर्ण सिंह से प्रार्थना है कि विश्व हिन्दी सम्मेलन करना उत्तम है। किन्तु अपने देश में जहाँ की राष्ट्रभाषा हिन्दी है, वहाँ कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका का कार्य हिन्दी में हो सकें, ऐसा प्रयास करें।
आम जनता से भी प्रार्थना है कि अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी बोलने एवं लिखने में स्वाभिमान का अनुभव करें तथा हिन्दी को राष्ट्रभाषा होने का गौरव प्रदान करें।
आज विश्व भाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रचलन बढ़ रहा है। अंग्रेजी पढ़ना, उसका ग्याता होना बुरी बात नहीं है। किन्तु राष्ट्रभाषा हिन्दी बोलने एवं लिखने में हमें गर्व का अनुभव करना चाहिए। बहुत से ऐसे लोग हैं जो अंग्रेजी के विद्वान होते हुए भी घर अथवा बाहर हिन्दी का ही प्रयोग लिखने व बोलने में करते है। वर्तमान में, विदेशों में जाने के बाद या यहाँ भी जो विदेशी कम्पनियाँ हैं, वे सभी कार्य अंग्रेजी में ही करती हैं, सेवा में भी अंग्रेजी जानने वालों को ही रखा जाता है। अतः अंग्रेजी का सीखना व जानना बुरा नहीं हैं। किन्तु प्रत्येक नागिरक को बोलने एवं लिखने में अपनी राष्ट्रभाषा का ही प्रयोग करना चाहिए।
मेरी संसद सदस्यों से भी करबद्ध प्रार्थना है कि वे भी हिन्दी या प्रान्तीय भाषाओं में ही बोलें। इससे देशवासी भी दूरदर्शन के माध्यम से प्रान्तीय भाषाओं का आनन्द ले सकेंगे। दूरदर्शन व आकाशवाणी से यह प्रार्थना है कि वे भी अपने प्रासारणा में हिन्दी व प्रान्तीय भाषा का ध्यान अवश्य रखें।
विभिन्न वस्तुओं के निर्माताओं पर विवरणा ऊपर हिन्दी में, नीचे प्रान्तीय भाषा में तथा उसके नीचे अंग्रेजी भाषा में लिखना चाहिए ताकि बहुसंखयक लोग उसे पढ़कर उपयोग में ला सकें। विदेशी कम्पिनयों से भी प्रार्थना है कि वे भारत की राष्ट्रभाषा का सम्मान करते हुए हिन्दी भाषा का ही लिखने एवं बोलने में प्रयोग करें।
जो विद्यालय अंग्रेजी माध्यम हैं, वे भी राष्ट्रभाषा हिन्दी पर विशेष ध्यान दें तथा अंकों को भी देवनागरी लिपि के अनुसार पढ़ायें । उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों से भी प्रार्थना है कि वे हिन्दी भाषा में ही बोलें एवं इसी में गर्व का अनुभाव करें।
डॉ० कर्ण सिंह से प्रार्थना है कि विश्व हिन्दी सम्मेलन करना उत्तम है। किन्तु अपने देश में जहाँ की राष्ट्रभाषा हिन्दी है, वहाँ कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका का कार्य हिन्दी में हो सकें, ऐसा प्रयास करें।
आम जनता से भी प्रार्थना है कि अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी बोलने एवं लिखने में स्वाभिमान का अनुभव करें तथा हिन्दी को राष्ट्रभाषा होने का गौरव प्रदान करें।
मोहन राय
३४, गोविन्द नगर शाहगंज, आगरा
ये भी हिन्दी बोलते हैं
प्रत्येक राष्ट्र की एक राष्ट्र भाषा होती है। उस भाषा पर देश के प्रत्येक नागरिक को गर्व होता है। एक विश्व भाषा होती है। प्राचीन काल में संस्कृत विश्व की भाषा थी। अब वह स्थान अंग्रेजी लेती जा रही है। किन्तु विश्व का प्रत्येक नागरिक अपने राष्ट्र की भाषा का सम्मान व उसी का उपयोग बोलने एवं लिखने में करता है। विदेशों से आए राष्ट्राध्यक्ष, चाहे वे ब्रिटेन, अमेरिका, जापान, रूस या खाड़ी देश कहीं के भी हों, अपनी राष्ट्र भाषा के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए उसी में बोलते हैं।
भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी है। अतः हम संकल्प करें कि हिन्दी में ही बातचीत करेंगें। १८५७ के बाद देश की आजादी के मार्गदर्शक लाल, बाल, पाल हिन्दी में ही बोलते थे। महात्मा गांधी, पं० जवाहर लाल नेहरू, पं० मदन मोहन मालवीय, मौलाना आजाद, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, सरदार बल्लभ भाई पटेल, श्री लाल बहादुर शास्त्री, डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णनन, डॉ० हेडगेवार, डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी, श्री माधव सदाशिव गोलवलकर, श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री चंद्रशेखर सिंह आदि सभी भारत के मान्य जन हिन्दी में ही प्रवचन करते थे। सम्पूर्ण देश सहर्ष स्वीकार करता था।
नवनिर्वाचित महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल अच्छी अंग्रेजी जानने के उपरान्त भी अपने भाषण हिन्दी में ही करतीं हैं। निवर्तमान उपराष्ट्रपति श्री भैंरों सिंह शेखावत जी हिन्दी का ही प्रयोग करते हैं। यह ही नहीं, उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार श्रीमती नजमा हेपतुल्ला व श्री अंसारी भी सामान्य रूप से हिन्दी का ही प्रयोग करते हैं। कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने भारत में आकर हिन्दी सीखी और अब हिन्दी में ही भाषण करतीं हैं। श्री राहुल गांधी भी अच्छी हिन्दी बोलते हैं। संघ के सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी कई भाषाओं के ग्याता होते हुए भी हिन्दी में ही भाषण करते हैं। भाजपा अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह, राजद अध्यक्ष श्री लालू प्रसाद यादव, सपा अध्यक्ष श्री मुलायम सिंह यादव, बसपा अध्यक्ष सुश्री मायावती एवं श्रीमती सुषमा स्वराज भी अंग्रेजी जानते हुए भी राष्ट्रभाषा हिन्दी में ही बोलते हैं। यहाँ तक कि रसायन मन्त्री श्री रामविलास पासवान ने औषधियों के डिब्बों पर हिन्दी भाषा में लिखने का आदेश कर दिया है तथा स्वयं भी हिन्दी ही बोलते हैं।
मोहन राय
३४, गोविन्द नगर शाहगंज, आगरा
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