14.8.15

चाचा की फेसबुक में चाची-6


डॉ. भानु प्रताप सिंह
चाची अनामिका ने ठान लई कि वो अपने ‘उनकी’ और मेरे चाचा अनार सिंह की मन की बात जानिकैं रहैगी। याई मारें चाची मेरे ढिंगा आई और कहन लगीं- लल्ला, नैंक फेसबुक तो खोलिओं। देखूं तो सही, तुमाए चाचा कौन-कौन के संग गुलछर्रे उड़ाय रएं और कौन-कौन सी छोरिन कूं पारटी दै रएं। 
चाची की बात सुनिकैं मैं समझि गौ कि अब चाचा पै अब बेभाव परिंगे। चाचा कूं कोऊ बचाय नांय पाबैगौ। चाचा ने पढ़िबे के पीछें बचपन में मेरी भौत पिटाई करी है, मैं तो चाहतूं कि चाचा की सारी पोलपट्टी खुलि जाए। मैं मन ई मन बड़ौ खुस भयो, लेकिन चाची कूं दिखाइबे कैं मारें बोलो- चाची, तुम कौन से चक्कर में पर रइयो। आदमिन कौ तो कामु है छोरिन कूं पटानौ। छोरी पटि गई तौ ठीक है, नांय पटी तो राम-राम। तुम देखि नांय रईं का लोकसभा में मोदी सरकार सोनिया गांधी कूं पटाइबे में लगी भई है। बे नांय मान नईं, तो हल्ला-गुल्ला मचि रौ ए।
चाची: तौ तुमने का मोय सोनिया गांधी समझि लौ ए।  मैं तो भौत सीधी-सादी हूं।  मोय हल्लौ-गुल्ला ते का कन्नौए। सोनिया तो ‘पप्पू’ की मम्मी हैं।  पप्पू के चक्कर में सोनिया गाँधी कूं कितनी सुननी पत्तै। सोनिया के घरवाले तो प्रधानमंत्री हते और हमारे मंत्री तक नानैं।
मोय लगी कै कछू गल्त बात कै दई। मैंने बात संभाली: अरे, चाची, तुम तो सुषमा स्वराज हौ। भारतीय नारी।
चाची: लल्ला, तुम फिर मेरौ दिमाग खराब कररए हौ। सुषमा कूं देखि लेउ। मुए ललित के चक्कर में सुषमा ने अपनी इमेज पै कालिख पोत दई। इत्तौ तौ मैं जान्तूं कि  लोकसभा में हंगामौ सुषमा के चक्कर में है रयौ है। खैर, मोय या ते का कन्नौऐ। मोय तो अपनौ घर देखनौ है। तुमाए चाचा कूं बिगड़ि बे ते बचानौ है।
मैंने कई: चाचा कूं बिगड़ि बे ते बचानौ है या तुम याइ देखि कैं घबराय रईयौ कि चाचा हाथ से निकरे जाइ रए हैं। सुंदर-सुंदर छोरी चाचा कूं लाइन मारि रई हैं, या चक्कर में तुमाई लाइन कटि सकतै।
चाची: मेई लाइन कोई नांय काटि सकतु। सांप कित्तौऊ टेढ़ौ चलै लेकिन बिल में तौ सीधौ ही घुसैगो। एक कहावत तो लल्ला तुमन्नै जरूर सुनी होयगी कि हड्डी देखि कैं कुत्ता की जीभ लपलपान लगतै। जब सब छोरी फेसबुक पै ‘पूनम पांडे’ बनिबे कूं तैयार बैठी है तो आदमी का करैगौ।
मैंने कई- चाची ऐसी बात नांय। तुम मोइये ले लेउ। मेरे सामने कितनीऊ सुंदर छोरी खड़ौ कद्देउ। मेरे मन में ऐसी-वैसी बात नांय आबैगी। रहीमदास जी ने कही है न- जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग, चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग। सारी बात चरित्तर की है। जाकौ चरित्तर अच्छौ है, बाकूं सुंदर छोरी से कोई फरक नांय पत्तु।
चाची: हां, जे बात तो सई है। मोय लगि रई है कि तुमाए चाचा कौ डीएनए ही खराबु है। डीएनए टेस्ट है जाय तो सब मालूम पज्जाइगी।
चाची कूं मोदी की भाषा में बात कत्तु देखि कैं मेरौ तो माथौ घूमि गौ। मैं समझि गौ कि चाची कूं मूरख बनानौ आसान नानै।

चाचा की फेसबुक में चाची-5


डॉ. भानु प्रताप सिंह
जैसौ कि तुम पैले तेई जान्तओ कि चाचा अनामिका बनि कैं चाचा अनार सिंह की फेसबुक में घुस गई है। चाचा की फ्रेंडलिस्ट में 290 छोरिन कूं देखिकैं चाची का माथौ घूमि गौ। चाची न जाने का-का सोचिबे लगि गई। चाची द्वै दिनन बाद मेरे ढिंगा आई और बोली- लल्ला का कररएओ?
मैंने कई- कररौ तो कछू नांय, पर तुम जे बताओ कि द्वै दिनन बाद आई हो। पैलैं तो रोज आय रईं। चाचा से झगड़ौ है गयो का।
मेरी बात सुनिकैं चाची बोली- ऐसी कोऊ बात नांय लल्ला। हां, तुमाए चाचा की फेसबुक में द्वै सौ नब्बे छोरिन कूं देखि कैं मेरा दिमाग खराब है गौए। मैं समझि नांय पाय रई कि या कौ का इलाज करूं। छोरिन के पीछें पागल है गएं तुमाए चाचा।
मैंने बोलौ- अरी चाची, या मैं दिमाग खराब करिबै की कौन सी बात है। फेसबुक में तो सब चल्तुए। छोरिन से बात करिकैं नैंक दिमाग फिरेश हो जातुए।
चाची- बात दिमाग फिरेश करिबे की नांय। जब ते तुमाए चाचा ने फेसबुक आईडी बनाई है, तब से रात में देर तक जागें। मोय लगि रई है जे छोरिन ते ई बात कत्त रैतएं। छोरिन कूं तो ‘स्वीट हार्ट’ कैबैं और मोपे झल्लातएं। वैसें, फेसबुक पै लाइन मार रए हैं। हे भगवान, तुमाई जे कैसी लीला है।
मैंने आग में घी डारौ और बोलो- चाची, ये लीला भगवान की नांय, चाचा की है। चाचा तो पूरै लीलाधर हैं। तुम देखौ न, छोरी 290 और चाचा अकेले। चाचा तो रासलीला कररए हैं। मोय तो ‘दार में कारौ’ लगि रौ है।
चाची: हां, लल्ला। तुम सई कै रए हौ। फेसबुक पै ई रासलीला है जाय रई है तो मेरे ढिंगा आय कैं का करिंगे। मोय तो आजकल ठीक चौं नांय देखि नांय रए, जे बात अब मेरी समझ में आय रई है।
मैंने लोहा गरमु देखि कैं चोट मारी: अच्छा, चाची दे बताओ कि चाचा ने तुमन्नैं साड़ी कब तें लाय के नांय दई?
चाची: लल्ला,सात-आठ महीना है गए। पै लें तो हर महीना कछू न कछू लात रैत ए। अब तो घर मेंं खाली हाथ आबतें।
मैंने चाची के कान में कूं करी: चाची, जे पैसा कां जाइरौए। जरूर फेसबुक की छोरिन पर खच्चु है रौए। चाचा छोरिन कूं पारटी देत हुंगे। याई मारें तुमन्नै कछू नांय लाय रए।
चाची: पर लल्ला, फेसबुक पै छोरिन को पतौ तो लिक्खौ नांय, फिर होटल में पारटी कैसैं है जाइगी।
मैंने कई: चाची, तुम बड़ी भोली हो। फेसबुक पै चैटिंग-फैटिंग कत्त-कत्त एक दूसरे कौ मोबाइल नम्बर लै लेत एं। फिर काऐ, कऊएं मिल लेउ।
चाची: या मैं गल्ती तो तुमाए चाचा की है। अपनौ मोबाइल नम्बर छोरिन कूं चौं दै रए हैं। या कौ मतलब जे भयो कि तुमाए चाचा के मन में जरूर कछू खोट है। अपनी लुगाई कूं छोड़ि कैं काऊ और कूं पारटी दैनो कोई अच्छी बात नांय। अब मोइयै कछू कन्नौ परैगौ।
चाची की बात सुनिकैं मैं मन ई मन भौत खुस भयौ कि चाचा कूं अब मालूम परैगी। 

चाचा की फेसबुक में चाची-4




डॉ. भानु प्रताप सिंह

मोय लगि रौए कि चाची कूं फेसबुक को चस्का लगगौ। तबई तौ मोते बेर-बेर पूछती रैबें- लल्ला कब तक फ्री हुंगे। मेरो पढ़िबे में मन नांय लगे पर फेसबुक में तो मैं ऊ घुसो रऊं। चाची ते तो मैं या ई कैतो कि अबई पढ़ि रौ ऊं। थोरी देर में बतांगो।  चाची कूं फेसबुक की हुड़क लग गई। चाचा तौ भंडाफोड़ करिबे कूं तैयार बैठी। या मारें चाची कूं नैकऊ चैन नां पररो। थोरी देर बाद चाची ने फिर पूछी- खाली है गए का लल्ला। मैंने कई- हां, चाची, अब मैं खाली हूं। चाची मुस्काबत भई बोली- फेसबुक खोलो। मोय नैंक जे बताओ कि तुम्हाए चाचा कौन-कौन सी छोरिन से बात कत्तएं।
मैने कई- जे कौन सो बड़ौ काम है।  चाचा की फ्रेंडलिस्ट से सब मालूम पज्जाइगी। मैंने चाची कूं बताई- चाचा की फ्रेंडलिस्ट में 420 जने हैं। इनमें 290 छोरी हैं। चाची ने ये बात सुनी तो चौंक गई। फिर बोलीं- कछुन के नाम तो बतइयों लल्ला। मैंने नाम गिनाए- रुखसाना, करीना, माहिरा खान, पूजा हेगड़े, कृति सैनन, अक्षरा हसन, रिद्धिमा सूद, सपना पब्बी, मधुरिमा तुली, तापसी पन्नू, हुमा कुरैशी, पूनम पांडे, भूमि पेडनेकर, सिद्धि, आसमां,  सोनाक्षी सिन्हा, ...।
‘इनके बारे में कछु बताओ तो सही।’ चाची ने कही।
‘अरे, चाची तुमन्नै का बताऊं। जे तो टाप ऐं टाप। इन छोरिन पै तो कोऊ लट्टू है जाबैगो। चाचा लट्टू है गए तो कोऊ बड्डी बात नानै।’
चाची बोली- ऐसी इनमें ऐसी का बात ए।
मैंने कई: चाची, तुम का जानौ। जब ये मुस्काबतें न, तौ हीया हिल-हिल जाबै। जे छोरी जैसौ कपड़ा-लत्ता पहन लेतएं, बोई फैसन बन जातुए।
चाची: अच्छा। पूनम पांडे तो बोई है न जो निमंग नंगी है जातै। याई ने तो कई कि इंडिया की टीम जीत जाइगी तो नंगी है जाइगी। तो लल्ला तुम जे बताओ कै नंगो है जाइबो फैसनु होतु है का।
चाची ने जब पूनम पांडे को नाम लयो तो मेरो माथो घूमि गौ। दिमाग में तरह-तरह की पिक्चर चलिबे लगीं। मोय लगो कि पूनम पांडे मोय देखि कैं मुस्काइ रई है। मैंने फौरन अपनी सिर झटकौ और चाची ते कई- चाची, आजकल नंगन कौ जमानौ है। पूनम पांडे नंगी है गई, तो हम बाके बारे में बात करि रए हैं। अगर नंगी न होती तो बाय कौन पूछिरो। संसद में सांसद नंगी-नंगी बात कररएं। भ्रष्टाचार पर लम्बौ-लम्बौ भाषण झाड़िबे बारे मौंह पे अलीगढ़ कौ तालौ मारि कैं बैठि गएं, ये ऊ तो नंगई है। वैसें तो हमाम में सब नंगे हैं पर हमाए नेता तो हमाम के बाहरऊ नंगे हैं। फेसबुक पै ऊ नंगई चल रई है।
चाची ने मेरी हां में हां मिलाई और लम्बी सांस भरिकैं बोलीं- सही कै रएऔ लल्ला। अपने चाचा कूं देखि लेउ। इनते जादा नंगो कौन मिलैगो। फेसबुक में मोय ‘अनामिका’ समझि कें पटाय रए हैं। सादीसुदा हैं, पर कुट्टु कुंआरे बने फिर रए हैं। इन छोरिन के चक्कर में नंगपनो करिबे लगगएं। जब मोय ब्याहि के लाएं, तब ऐसे नाए। तब तो मोय छोड़िकें काऊ कूं आँख उठाय के नांय देखते। जब तें फेसबुक के चक्कर में परे हैं, तब ते नंगपनो सीख गएं।

चाचा की फेसबुक में चाची-3

डॉ. भानु प्रताप सिंह

जुगाड़ करि कराय कें चाची अनामिका बनकर चाचा अनार सिंह की फेसबुक में घुस गई। दोउन में चैटिंग-फैटिंग होने लगी। चाची साम कूं मेरे ढिंगा आई और बोली- नैक देखियों लल्ला, फेसबुक पर का है रौए। मैंने चाची की फेसबुक आईडी खोली तो बा पे चाचा की ओर से हैलो.. हैलो डियर, कहां हो, बिजी हो लिखा हुआ था। मैंने कही चाची, लोहौ गरमु है। बताओ, का लिखनौ ऐ। अब चाची बताय जात रई और मैं लिखत जात रयो।
चाची: हैलो जी।
चाचा: मिस्ड यू टू मच।
चाची: मैं ऊ तुमन्नै मिस कर रई। मम्मी खर्राटे भर रई हैं, तो मैं बात कर पाय रई हूं।
चाचा: मम्मी सोय गईं, गे तो भौत अच्छो भयो। अब हम खुलिकें बतिया सकें।
चाची: चौं नाय,  खुलिकेंईं बात होनी चइयें।
चाचा: मैं पूछिरो, कल्लि मेरी याद आई कै नाय। सच्ची बतइयों।
चाची: याद तो भौत आई। तुम भौत अच्छे हो। नैंक ये तो बताओ कि तुम मेरे बारे में का सोचतौ।
चाचा: तुम तो चौदवीं कौ चांद हो। तुमाए लएं तो अमिताभ बच्चन ने गानौ गायो है- ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना..
चाची: ज्यादा फैंको मती। तुम लड़के ऐसे गानौ सुनायं को छोरिन की पटाय लेतओ और अपनो काम  निकार के छोड़ देतओ। मन्नौ तो छोरिन को है जातुए। 
चाचा: जे तुम सही बात कै रईओ। आजकल्लि के छोरा ऐसेई हैं। तुम मो पै बिस्वासु करिकें देखो।
चाची: चलौ कल्लौ बिस्वासु। अब का कैनोए।
चाचा: तुमन्नै मो पै बिस्वासु कल्लौ, अब मोय कछू नाय चइयैं। अगर तुम मिल जाओ, जमाना छोड़ि देंगे हम...
चाची: तुम फिर फैंकिबे लगे। अच्छा ये बताओ, तुम इतने अच्छे हो, तोऊ सादी चौं नाय करी। तुमन्नै तो भौत छोरी मिल जाइंगी।
चाचा: छोरी तो मुकती हैं, लेकिन मोय ऐसी चंइये, जो तुम्हारे जैसी टनाटन हो। सच्ची बताइ रौऊं, रात में तुम सपने में आत रहीं। सपनों की रानी बन गई हो तुम तो।
चाची: अच्छा..  मोय बैलाइकें अपनी काम निकान्नौ चाहो। तुमाई फ्रेंड लिस्ट में तो भौत छोरी हैं। मेरे अलावा और कौन-कौन कूं सपनों की रानी बताय चुके हो।
चाचा: जे का कै रइयौ। अगर तुम मो पै सक करि रई तो मैं सबन कूं अनफ्रेंड कद्दंगौ। सब छोरी तुमाए पांवन की धूल लगें।
चाची: अच्छा, तुमन्नै मेरे पांव ऊ देख लए। और का-का देखिबे कौ इरादौ है।
चाचा: जो तुमाई मरजी होयगी...
चाची: अब तुम बदमासी कररए हो। ऐसी बात करौगे तो मैं तुमन तो बात नाय करुंगी।
चाचा: अरे, तुम तो बुरौ मान गईं। मैं तो मजाक कररौ। मैं याय बात कूं अच्छी तरह जानतूं कि तुम भौत दिलखुश हो। तुम तो जा घर में जाओगी बाय सुरग बनाय दोगी। 
अब चाची ने मोते कई, देख लई लल्ला। तुमाए चाचा कैसे पटाय रएं ‘अनामिका’ कूं। अगर मो ते इत्ते प्यार से बात कत्त रैबें तो मैं अपनी जानए दे दुंगी। मोते कबऊं नांय बताओ सपनों का रानी। मोते कबऊं नांय कई- चौदवीं कौ चांद। मन में तो ऐसी आय रई है कि तुमाए चाचा की चांद फोर दऊं। मैंने सलाह दई- चाची चांद नांय, चाचा कौ भंडा फोड़ो भंडा।

चाचा की फेसबुक में चाची-1

डॉ. भानु प्रताप सिंह
 ‘ए लल्ला, कछू काम कर रएओ का’, चाची ने मोते बड़े प्यार ते सवाल करौ तो मैं चक्कर में परिगौ।
मैंने अपनी नजर मोबाइल की स्क्रीन पर टिकाय रखी। व्हां से नजर हटाए बिना बोलौ- ‘नांय चाची, कुछ खास काम नाएं। मैं तो ऐसेईं मोबाइल देख रौऊं।’
‘अच्छा, एक बात बताओगे सही-सही। झूठ तो नांय बोलोगे।’
चाची कौ सवाल सुनि कैं मोय सबरी छोरिन के चेहरा याद आय गए। मैं मन ई मन में सोचिबै लगौ, चाचीये कैसै पतौ परि गई। जरूर भोलू ने कई होयगी। अबई तो प्रेमकहानी ठीक तै सुरू नाय है पाई और सबकूं खबर लगि गई। अब का होयगौ। चाची ने अगर पापा कूं बताय दई तो भौत मार परैगी। मैं मार परिबे की सोच कैं ई  कांपिबै लगि गौ। लगतौए  चाची ने मेरी हालत देख लई हती, तबई तो बोलीं- ‘का भयौ लल्ला, इत्ते परेसान से चौं है गए।’
मैंने अपनी परेसानी छिपाई और बोलौ- ‘नांय चाची, ऐसी कोई बात नाएं। तुम बताओ, का पूंछ रईं।’
‘लल्ला, मैं पूछि रई कि जे फेसबुक का हौबै?’ चाची को सवाल सुनिकैं मैं फिर चौंक गौ।
‘अरे, चाची तुम्हें का कन्नौ या फेसबुक ते।’ मैंने चाची को टारिबे की नीयत से बात कही।
‘नांय लल्ला, मोय बताओ और सच्ची-सच्ची बताई। तुम्हें विद्यारानी की कसम है।’ चाची ने अपनौ हक जमात भये अपनी बात कही।
‘चाची, फेसबुक कछू नांय। जे तो छोरा-छोरिन के चौचले हैं। जिन पै फालतू टैम होतुए न, वो छोरा -छोरी आपस में बात कत्त रैतएं और उनके टैम कटि जातुए।’ मैंने चाची कूं समझाएबे के अंदाज में पूरी बात बताई। फिर मैंने पूछी- ‘चाची तुम्हें का कन्नौए फेसबुक ते। फेसबुक के चक्कर में तुम इतनी परेसान चौंऔ।’
मेरी बात सुनिकैं चाची की आंखिन में पानी आय गौ। अपनी नजरें नीचीं करकैं बोलीं- ‘लल्ला, बात जे ए कि तुम्हारे चाचा रात में लैपटॉप पर बिजी रैवें। एक दिन मैंने पूछी तो कहन लगे कि आफिस कौ काम है। कल्लि मैं तुम्हारे चाचा कूं दूध दैबे गई तो मेरी नजर लैपटाप पै परि गई। बा पै फैसबुक लिखी आय रई। तमाम छोरिन के फोटू दिखाई दए। फोटुन में छोरी बेसरमन की तरह मौं फारि के हँस रईं। मोय तो कछु गड़बड़ लगि रई है।’
चाची की बात सुनि कैं मैं हँसे बिना नांय रै सकौ। मैंने कई- ‘चाची, या मैं परेसान है बे की कोई बात नांय। फेसबुक पै तो मैं ऊ हतूं।’
‘तुम्हाई बात और है लल्ला। तुम्हारे चाचा की बात और है। आजकल की छोरिन की नैकई भरोसौ नांय। जगह-जगह मौंह मात्ति फित्तैं। तुम्हारे चाचा ऊ कछु कम नांय। कछु करौ लल्ला। ’
चाची की बात सुनिकैं मैं पसीज गौ। मैंने चाची की ‘अनामिका’ के नाम ते फेसबुक आईडी बनाय दई है। चाचा ने फ्रेंड रुकेस्ट स्वीकार लई है। अब चाची, चाचा की फेसबुक पर दोऊ दीदा लगाय कें देखती रैबें।

25.7.14

चिड़ियाघर, शेर, चायवाला और चाय



डॉ. भानु प्रताप सिंह

आज इस लेख का श्रीगणेश छोटी सी कहानी से करते हैं। कहानी कुछ इस प्रकार है- 
एक चिड़ियाघर से दो शेर भाग गए। एक शेर जंगल से पकड़ा गया था, इसलिए वह जंगल की ओर भागा। दूसरा शेर चिड़ियाघर में पैदा हुआ था, इसलिए शहरी प्रवृत्ति का था और वह शहर की ओर भागा। तीन दिन बाद जंगल की ओर भागा शेर पकड़ा गया। उसे फिर से चिड़ियाघर में बन्द कर दिया गया। कई महीने बीत गए, शहरी शेर का कोई पता नहीं चल पा रहा था। छह महीने बाद शहरी शेर पकड़ा गया और उसे फिर से चिड़ियाघर में बन्द कर दिया गया।
जंगली शेर ने जब शहरी शेर को अपने साथ देखा तो बड़ा आश्चर्य हुआ। 
उसने पूछा, खुदा के लिए मुझे बताओ कि तुम छह माह तक शहरी लोगों के बीच किस तरह रह पाए?
शहरी शेर ने कहा- कुछ नहीं यार, मैं सरकारी कार्यालय में गया और वहां धूल भरी फाइलों के ढेर के पीछे छिप गया। फाइलों की ओर कोई नहीं आता था।
जंगली शेर ने पूछा- लेकिन तुमने वहां पेट कैसे भरा।
शहरी शेर- अरे, वहां सरकारी कर्मचारियों की अबाध आपूर्ति थी। मैं किसी एक को खाता, सरकार पांच और भर्ती कर लेती। चूंकि वहां कोई काम नहीं करता है, इसलिए मेरे खाने के बाद गायब हुए व्यक्ति की चिन्ता किसी को नहीं थी।
जंगली शेर- वाह, फिर तुम पकड़े कैसे गए?
शहरी शेर: गलती कर गया यार। एक दिन मैंने चाय वाले को खा लिया। पूरे कार्यालय में काम बन्द हो गया। उन्होंने चाय वाले को ढूंढने के लिए सघन अभियान चला दिया और मैं पकड़ा गया।
चायवाला आम आदमी, चाय यानी रिश्वत
यह कहानी हमें बताती है कि हमारे सरकारी कार्यालयों में किस तरह से ‘मक्कारी’ होती है। सरकारी कार्यालयों में काम के अलावा सबकुछ होता है। सरकारी कार्यालयों में अपना काम कराना ‘लोहे के चने चबाने’ से कम नहीं है। इस कहानी  में चाय वाला सामान्य नागरिक है। चाय को रिश्वत के प्रतीक बतौर लिया गया है। चिड़ियाघर सरकारी कार्यालय की तरह है। चाय पिलाए बिना यानी रिश्वत का पहिया लगाए बिना फाइलें आगे बढ़ती नहीं हैं। सरकार ने कितने ही प्रयास कर लिए हैं, लेकिन सरकारी कामकाज का ढर्रा नहीं बदला है। सरकारी कर्मचारी का काम साधारण से काम में भी अड़ंगा लगाना है। जब  रिश्वत रूपी चाय मिलनी बन्द हो जाती है, तब वह शिकार की तलाश में निकलता है। कहानी में शेर को अधिकारी मान लीजिए। वह फाइलों के पीछे आंख-कान बन्द करके बैठा रहता है। कोई चिन्ता नहीं है। अधिकारी को अपना ‘हिस्सा’ मिलता रहता है और वह मौज करता रहता है। 
चिड़ियाघर के कर्मी यानी सीबीआई
चिड़ियाघर के कर्मचारी केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की तरह ऐसे अफसरों को पकड़ लेते हैं, तब जाकर बात खुलती है। मध्याह्न भोजन योजना (मिड-डे-मील) में यही तो हुआ है। सीबीआई जांच कर रही है, तो मैनपुरी के पूर्व जिलाधिकारी सच्चिदानंद दुबे और अलीगढ़ विकास प्राधिकरण (एडीए) के उपाध्यक्ष जेबी सिंह को गिरफ्तार किया गया है। ये अधिकारी चिड़ियाघर से भागे शेर की तरह फाइलों के पीछे आंख बंद करके बैठे रहे और निचले स्तर पर तैनात कर्मचारी छह करोड़ रुपये का घोटाला कर गए। ये अधिकारी कुछ भी सफाई  दें, लेकिन अगर ये अधिकारी आंख-कान खुले रखते तो छात्रों के निवाले को कोई और हजम कर पाता क्या? उनके अधीनस्थ कर्मचारी रिश्वत रूपी चाय पीते रहे और अपनी जेब भरते रहे। कितनी अजीब बात है कि जिन पर घोटाला रोकने की जिम्मेदारी है, वे ही इसमें लिप्त मिले हैं। इस तरह के घोटाले तभी खुलते हैं, जब जांच सीबीआई को मिलती है। मुझे लगता है कि इस तरह के मिड-डे-मील घोटाले हर जिले में हैं।
सरकारी योजनाएं
केन्द्र और प्रदेश सरकार की योजनाएं भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गई हैं। कभी-कभी तो लगता है कि ये योजनाएं सरकारी कर्मचारियों और इन्हें चलाने वाली संस्थाओं के लिए ही बनाई गयी हैं। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा शुरू की गई बेरोजगारी भत्ता योजना को ही लें, इसमें तमाम अपात्रों को भत्ता दिया गया। कुछ लोगों से बाद में वसूली की गई, लेकिन अन्य हजारों लोग तो ‘माल’ खा ही गए। इसी तरह के आरोप लैपटॉप वितरण योजना में भी लगते रहे हैं। सरकार की दोनों योजनाएं लाजवाब हैं, लेकिन सरकारी कर्मचारी इनका बैंड बजाने से नहीं चूके। सरकार ने दोनों योजनाएं बन्द कर दी हैं। इसका जितना दुख लाभार्थियों को नहीं होगा, उससे अधिक दुख सरकारी कर्मचारियों को है। केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा (महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) भी भ्रष्टाचार की शिकार है। कुछ राज्यों में हुए घोटालों की जांच सीबीआई कर रही है। इस योजना के तहत हर जिले में भ्रष्टाचार हो रहा है। हमारे माननीय ‘प्रधान जी’ भी भ्रष्टाचार के गटर में गोते लगा रहे हैं। इन्हीं प्रधानजी की जिम्मेदारी है मनरेगा को चलाने की। यही घोटाला करेंगे, तो रोकेगा कौन? 
और अन्त में...
महंगाई पर दो पंक्तियों का व्यंग्य देखिए-
डॉलर की क्या औकात है
हमारे तो टमाटर भी उससे महंगे हैं...
(लेखक ‘द सी एक्सप्रेस’ के सम्पादक हैं)

20.7.14

हिन्दी

हिन्दुस्तान में हिन्दी दिवस, यह हिन्दी का अपमान है,
भारत हिन्दी, हिन्दी भारत, हिन्दी भारत का प्राण है।
हम भारत के प्राण बचाएं, रग-रग में बस जाए हिन्दी..